सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) का एक पुराना बयान फिर से सुर्खियों में है, जिसमें उन्होंने कहा था— “हम इस्लामिक चरमपंथ को खत्म करना चाहते हैं और अन्य धर्मों के साथ सह-अस्तित्व चाहते हैं।” यह बयान उस समय दिया गया था जब सऊदी अरब में व्यापक सामाजिक और धार्मिक सुधार किए जा रहे थे। अब जब यह बयान फिर से चर्चा में है, तो यह सवाल उठता है कि क्या सऊदी अरब वाकई एक उदार इस्लामी राष्ट्र बनने की दिशा में बढ़ रहा है?
इस्लामिक चरमपंथ पर सऊदी की बदली हुई नीति
सऊदी अरब, जो दशकों तक वहाबियत और कट्टरपंथी इस्लामी कानूनों के लिए जाना जाता था, अब खुलकर धार्मिक उदारवाद और आधुनिकता की बात कर रहा है। मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में कई ऐसे कदम उठाए गए हैं, जो सऊदी की पारंपरिक छवि के विपरीत हैं:
- कट्टरपंथी धार्मिक संस्थानों की शक्ति सीमित की गई।
- शरिया कानून की सख्ती को कम किया गया।
- महिलाओं के अधिकारों में विस्तार किया गया।
- संगीत, सिनेमा और मनोरंजन उद्योग को बढ़ावा दिया गया।
- विदेशी निवेश और पर्यटन को आकर्षित करने के लिए सामाजिक सुधार लागू किए गए।
क्या यह बदलाव असली हैं या दिखावटी?
सऊदी सरकार का दावा है कि वह इस्लामी कट्टरता को खत्म करके देश को “मॉडर्न इस्लामिक स्टेट” बनाना चाहती है। हालांकि, कई आलोचक इसे केवल “इमेज बिल्डिंग” का हिस्सा मानते हैं। इसकी दो बड़ी वजहें हैं—
- राजनीतिक रणनीति: सऊदी अरब, जो कभी पूरी दुनिया में वहाबी इस्लाम फैलाने में अग्रणी था, अब जब खुद पर आतंकवाद को समर्थन देने के आरोप लगने लगे, तो उसने अपनी छवि सुधारने का फैसला किया।
- आर्थिक मजबूरी: सऊदी की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रह सकती। इसलिए देश को टूरिज्म और अन्य क्षेत्रों में विदेशी निवेश चाहिए, जो बिना उदार सुधारों के संभव नहीं।
क्या सऊदी अरब सच में उदार इस्लाम की ओर बढ़ रहा है?
मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में कई बड़े सुधार हुए हैं, लेकिन क्या यह स्थायी होंगे? कई लोग मानते हैं कि जैसे ही सत्ता बदलती है, सऊदी फिर पुराने रास्ते पर लौट सकता है। अभी भी वहाँ राजनीतिक असहमति को कुचला जाता है, मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, और इस्लामी कानूनों में पूरी तरह बदलाव नहीं किया गया है।
फिर भी, यह बयान और इसके पीछे की नीति इस्लामिक दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है।
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