छरबा के खेतों में लहलहाती गेहूं की बालियां हरे रंग को छोड़ते हुए धीरे-धीरे सुनहरी होती जा रही हैं। उधर, सहसपुर के बाजारों में कई दुकानें ईद के पकवानों से सजी हैं। सेलाकुई में खाटूश्याम जी के कुछ भक्त सड़क पर लेट-लेटकर मंदिर जा रहे हैं।
यानि की जीवन रोज की तरह चल रहा है, लेकिन इस सबके बीच लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार कहीं नजर नहीं आ रहा। लोकतंत्र का उत्सव माने जाने वाले चुनाव का रंग इस मर्तबा फीका है। इस बीच कुछ क्षेत्रों में कई मतदाता, पार्टी और उसके निशान को तो जानते हैं पर संबंधित लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों से वो बेखबर हैं।
सोमवार को टिहरी संसदीय क्षेत्र के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों का जायजा लिया तो कमोवेश यही तस्वीर नजर आई। ग्रामीण, किसान मुद्दों के रूप में महंगाई, बेरोजगारी, आवारा पशु, वन्यजीवों से हो रही मुश्किलों का जिक्र करते हैं। चुनाव पर लोग अपने मन की बात साझा करने से हिचकते हैं, पर उनके चेहरे से झलक रहा है कि वो वोट की गोपनीयता बनाए रखना चाहते हैं।
सुबह नौ बजे का वक्त है। झाझरा के पास अपने रिश्तेदार को छोड़ने आए हेडवाली गांव के बुजुर्ग बाबूराम कहते हैं, सब कुछ ठीक ही है। अनाज मिल रहा है, पेंशन मिल रही है। हां, महंगाई जरूर जरा बढ़ गई है। चुनाव प्रचार पर वो कहते है कि इस बार सब फीका फीका है। हमारे यहां तो कोई आता भी नहीं है। हां, पर मेरा तो तय है कि किसे वोट देना है।
पूछने पर वो अपने क्षेत्र के सांसद का नाम नहीं बता पाते, लेकिन प्रधानमंत्री का नाम वो जानते हैं। तपाक से कहते हैं, अजी उन्हें क्यों न पहचानेंगे भला? कुछ आगे सड़क के किनारे सिंघनीवाला के मोहम्मद इस्लाम अपनी घोडा बुग्गी लिए खड़े हैं। वो कहते अब क्या कहें और किसे कहें? महंगाई दिन ब दिन बढ़ रही है। रोजगार के रास्ते भी ज्यादा नहीं दिखते।
सरकार राशन तो जरूर देती है लेकिन वो भी पूरा कहां मिलता है? रही चुनाव की बात तो आप देख ही रहे हैं, कोई कहीं दिख ही नहीं रहा। आगे सहसपुर में पूर्व प्रधान नफीस अहमद, उनके भाई, मोहम्मद शाहिद, चाचा शरीफ अहमद घर के बाहर बनी दुकान में बैठे हैं।
कहते हैं, देखिए गैस का सिलेंडर, डीजल-पेट्रोल कितना महंगा हो गया? बिजली-पानी सब महंगा। सरकार ने कुछ काम अच्छे किए हैं लेकिन कुछ प्रभावित भी हुआ है। शाहिद राज्य में सख्त भू-कानून की भी पैरवी करते हैं।
कहते हैं कि इससे हमारे उत्तराखंड की खेती की जमीनें बच जाएंगी।दोपहर हो चुकी है। सहसपुर से आगे छरबा में मदन सिंह तोमर के घर के बाहर बैठकी लगी है। पास के ही रविंद्र सिंह चौहान, राजकुमार, देवेंद्र भी चर्चा में शामिल हैं। महंगाई, बेरोजगारी पर वो कहते हैं, देखिए ये तो होना ही है।
आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है। किसानों के सामने समस्या इस वक्त आवारा जानवरों और जंगली जानवरों की है। ये खेती को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं। सरकार इस तरफ जरूर ध्यान दें। चुनाव का सवाल आते ही सभी थोड़ा सतर्क हो जाते हैं। वो कहते, अब कहने की बात नहीं है। सब लोग जागरूक हैं।
ग्रामीणों से इस मुलाकात के दौरान ज्यादातर लोग ऐसे मिले जो अपने क्षेत्र के प्रत्याशी को नहीं जानते। वो कहते हैं कि अब तक न कोई मिलने आया है और न ही उन्होंने किसी प्रत्याशी को देखा है। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सब जानते हैं।
छरबा के रविंद्र सिंह चौहान कहते हैं, मोदी जी को, राहुल गांधी को कौन नहीं पहचानेगा? हां, इनके प्रत्याशियों को पहचानने में गफलत हो सकती है क्योंकि कोई दिखता ही नहीं है। गुलदार के आतंक से परेशान कुछ किसानों ने विदेश से चीते लाए जाने पर नाराजगी जताई।
छरबा के रविंद्र सिंह चौहान, राजकुमार, मदन सिंह तोमर कहते हैं कि केंद्र सरकार ने कई अच्छे काम किए हैं। लेकिन विदेश से चीते लाने की क्या जरूरत थी? इसका जनता को क्या लाभ? देखिए हमारे यहां तो गुलदारों की वजह से रात को बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
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