“GD बख्शी की चेतावनी: सीमित युद्ध से पाक की अर्थव्यवस्था डूबेगी, तीनों सेनाएं करेंगी संयुक्त प्रहार”
सेना की वर्दी में, दमदार आवाज़ और ज्वलंत शब्दों के साथ, मेजर जनरल डॉ. जी.डी. बख्शी एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। उनकी यह टिप्पणी कि “पाक को अब कीमत चुकानी होगी, और यह एक सीमित युद्ध हो सकता है जो उसकी अर्थव्यवस्था को डुबो देगा,” — न केवल मीडिया की सुर्खियाँ बनी, बल्कि एक रणनीतिक चेतावनी भी बन गई है।

मोदी बनाम इंदिरा: ‘फ्री हैंड’ की ऐतिहासिक प्रतिध्वनि
बख्शी ने जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीनों सेनाओं को “फ्री हैंड” देने की बात कही, वह सीधे 1971 की याद दिलाती है जब इंदिरा गांधी ने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को ऐसा ही निर्णयात्मक अधिकार दिया था। उस समय परिणाम था – बांग्लादेश का जन्म और पाकिस्तान की करारी हार।
क्या अब इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है?
सीमित युद्ध की चेतावनी – सैन्य दृष्टिकोण या रणनीतिक संकल्प?
डॉ. बख्शी ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान को अब दंडात्मक कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए।
“यह एक सीमित युद्ध हो सकता है जिसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना, तीनों समन्वित रूप से कार्य करेंगी। यह युद्ध पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को डुबो सकता है।”
यह कथन स्पष्ट करता है कि अब केवल आतंकियों को लक्षित करने का समय नहीं है, बल्कि राज्य प्रायोजित आतंक के पीछे खड़ी मशीनरी को झकझोरने की आवश्यकता है।
पाकिस्तान के संभावित विघटन की भविष्यवाणी
बख्शी ने सोवियत संघ के 1990 में हुए विघटन को उदाहरण देते हुए यह भी कहा:
“जब सोवियत अर्थव्यवस्था ढही, तो USSR 15 टुकड़ों में बंट गया। पाकिस्तान भी ऐसी ही नियति की ओर बढ़ सकता है – और वह 5 टुकड़ों में बंट सकता है।”
यह कथन न केवल पाकिस्तान को एक रणनीतिक चेतावनी है, बल्कि वैश्विक कूटनीति और पड़ोसी देशों के लिए भी एक संकेत है कि दक्षिण एशिया में बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव संभव है।
कूटनीतिक हलचल और मीडिया प्रभाव
डॉ. बख्शी की इस टिप्पणी ने न केवल टीवी डिबेट्स और सोशल मीडिया पर तूफान मचाया है, बल्कि रणनीतिक विश्लेषकों के बीच भी यह बहस शुरू हो गई है –
क्या भारत अब ‘डिटरेंस’ की नीति को छोड़ ‘पनिशमेंट’ की ओर बढ़ रहा है?
क्या वाकई होगा सीमित युद्ध?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक सैन्य बयान नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत है। भारत अब पाकिस्तान के साथ पुरानी शैली की ‘रणनीतिक सहनशीलता’ को पीछे छोड़ सकता है, विशेषकर तब, जब वैश्विक पटल पर भारत की स्थिति और ताकत दिन-ब-दिन मजबूत हो रही है।
बख्शी का यह बयान केवल एक सैनिक की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक संभावित नीति परिवर्तन की झलक भी हो सकता है। सवाल अब यह नहीं कि भारत क्या कर सकता है – सवाल यह है कि भारत अब क्या करने जा रहा है?
क्या यह युद्ध केवल सीमित होगा या इसके प्रभाव असीमित?
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