टिहरी लोकसभा के चुनावी समर में भाजपा ने राजपरिवार के सहारे नौ में से आठ बार जीत दर्ज की, लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि भाजपा लगातार जीत के बावजूद कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के रूप में स्थापित जड़ों को नहीं हिला पाई।पिछले तीन चुनाव से (एक उपचुनाव, दो चुवाव) भाजपा की ओर से राजपरिवार की सदस्य माला राज्यलक्ष्मी शाह लोकसभा में टिहरी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। इन दो चुनाव में कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक करीब ढाई फीसदी ही खिसक पाया। सियासी जानकारों का मानना है कि इसी वोट बैंक पर सेंध लगाने के लिए भाजपा ने बूथ प्रबंधन का विशेष अभियान चलाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का यह बूथ प्रबंधन भी कसौटी पर होगा।
चुनावी इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि टिहरी लोकसभा सीट पर अब तक हुए चुनावों में राज परिवार का वर्चस्व रहा। आजादी के बाद से 90 के दशक तक यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा है। जिस दल में राज परिवार रहा उस दल को ही यहां से अकसर जीत मिलती रही, लेकिन लगातार दो आम चुनावों में हार के बावजूद राज परिवार का जादू कांग्रेस की जड़ों को नहीं हिला पाया। कांग्रेस को 2014 में 31 फीसदी और 2019 में 30 फीसदी मत मिले थे।
2019 में चुनाव हार गए थे प्रीतम सिंह
1949 में टिहरी रियासत का भारतीय संघ में विलय के बाद 1951-52 के पहले लोकसभा चुनाव में राजा मानवेंद्र शाह को चुनाव लड़ाने की तैयारी थी, लेकिन उनका नामांकन खारिज होने पर महारानी कमलेंदुमति को निर्दलीय चुनाव में उतारा गया और उन्होंने जीत हासिल की। 1957 से 1989 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। 1977 में त्रेपन सिंह नेगी बीएलडी से चुनाव जीते और 1980 में कांग्रेस टिकट पर चुनाव जीता। राज परिवार के भाजपा में शामिल होने के बाद 1991 में मानवेंद्र शाह से भाजपा के टिकट चुनाव जीता और 2004 तक लगातार सांसद चुने गए। 2009 में कांग्रेस से विजय बहुगुणा ने जीत हासिल की। इसके बाद इस सीट पर भाजपा का कब्जा है। 2014 में कांग्रेस से साकेत बहुगुणा और 2019 में प्रीतम सिंह यहां से चुनाव हार गए थे।
राजपरिवार और हरीश रावत परिवार तक सीमित रहा टिकट
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