उत्तरी भारत के पर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड में अब कचरा सिर्फ कचरा नहीं रहा—यह ऊर्जा, आय और अवसर का नया स्त्रोत बन रहा है। मंत्रालय की रिपोर्ट Mountains of Change बताती है कि राज्य के शहरी निकाय अब पारंपरिक कचरा इकट्ठा करने से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक और समुदाय आधारित मॉडल से एक नया इकोसिस्टम खड़ा कर रहे हैं।
यह बदलाव सिर्फ नीति-स्तर का नहीं, ज़मीन पर चल रहा एक ऑपरेशनल ट्रांसफॉर्मेशन है, जिसे पहाड़ी भूगोल ने और दिलचस्प बनाया है।
रुद्रपुर और मसूरी: कचरे से ऊर्जा बनने का नया अध्याय
मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों ने वेस्ट-टू-एनर्जी मॉडल को अपनी कार्यप्रणाली में शामिल कर प्रतिस्पर्धी प्रगति दिखाई।
रुद्रपुर: 50 TPD CBG प्लांट की बड़ी छलांग
शहर में प्रतिदिन निकलने वाले 105–118 MT कचरे का दबाव कम करने के लिए 2022 में पीपीपी मॉडल पर CBG प्लांट शुरू हुआ।
गीले कचरे से ‘कल्याणी’ खाद और बायोगैस बनती है, जो आगे बिजली उत्पादन में काम आती है। यह मॉडल मैदानी शहरीकरण का एक प्रभावी समाधान बन गया है।
मसूरी: पर्यटक भार और पहाड़ी कचरे का स्मार्ट समाधान
‘पहाड़ों की रानी’ में 8 TPD बायो-मेथनेशन प्लांट ने पर्यटन सीज़न में बढ़ते कचरे को संसाधन में बदलना शुरू किया है। खाद और बायोगैस दोनों की प्रभावी उत्पादन श्रृंखला यहाँ बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
कीर्तिनगर: कठिन भौगोलिक हालात में भी नवाचार
उच्च ढलानों और वन्यजीव घनत्व वाले इस क्षेत्र में कचरा प्रबंधन आसान नहीं था।
2023 में शुरू हुई वेस्ट प्रोसेसिंग फैसिलिटी, एरोबिक कंपोस्टिंग पिट्स और MRF का उपयोग कर एक नए मॉडल के रूप में उभरी।
नवाचार और कठिन परिस्थितियों में परिणाम देने के लिए कीर्तिनगर को 2024 में स्कॉच सिल्वर अवार्ड मिला।
जोशीमठ: ट्रेकिंग हब में कचरा प्रबंधन से आय का बदलाव
जोशीमठ में 2010 में शुरू हुई MRF ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा भरी है।
2022 से अब तक 1.3 मिलियन किलो अकार्बनिक कचरे की प्रोसेसिंग से 1 करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व आया।
सफाई कर्मचारियों की आय सीधे 250 रुपये से बढ़कर 550 रुपये होना इस बदलाव का सबसे मानवीय पक्ष है।
बागेश्वर और हल्द्वानी: महिलाओं के हाथों स्वच्छता की रीढ़
राज्य की स्वच्छता यात्रा में महिलाओं ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है।
बागेश्वर: ‘सखी समिति’ की मिसाल
डोर-टू-डोर कचरा संग्रह के मॉडल ने पूरे शहर की छवि बदल दी।
कभी ‘कूड़ेवाली’ कहे जाने वाली महिलाएँ आज राष्ट्रीय पहचान बना चुकी हैं।
हल्द्वानी: ‘बैणी सेना’ का आर्थिक रूपांतरण
SHGs की भागीदारी के बाद यूज़र चार्ज 6 लाख से बढ़कर 32 लाख प्रतिमाह पहुँच गया।
हर सदस्य औसतन 14,000 रुपये मासिक अर्जित कर रही है। यह स्वच्छता की अर्थव्यवस्था का नया चेहरा है।
रुद्रपुर: पुराने डंपयार्ड से हरियाली की नई कहानी
2,11,000 MT लेगेसी वेस्ट को बायो-माइनिंग से हटाकर हाईवे के पास पड़े विशाल कचरे के ढेर को पूरी तरह हरित क्षेत्र में बदल दिया गया।
शहर को एक नया सार्वजनिक स्थल मिला—यह परिवर्तन किसी प्रतीक से कम नहीं।
केदारनाथ: तीर्थ यात्रा का डिजिटल रिफंड मॉडल
चारधाम यात्रा के दौरान प्लास्टिक बोतलों की समस्या ने नया मोड़ लिया जब यहाँ QR आधारित डिपॉजिट रिफंड सिस्टम लागू किया गया।
बोतल जमा करते ही 10 रुपये का रिफंड डिजिटल रूप से मिलता है।
अब तक 20 लाख बोतलें रीसाइकिल होकर 66 MT CO₂ उत्सर्जन रोका जा चुका है।
ग्रीन गुरुकुल और स्वच्छता पार्क: भविष्य की पीढ़ी के लिए सीख
स्कूलों में चल रहा ‘ग्रीन गुरुकुल’ 40 हजार से अधिक बच्चों को गेम-बेस्ड लर्निंग के जरिए कचरा प्रबंधन का विज्ञान सिखा रहा है।
देहरादून का स्वच्छता पार्क कचरा प्रोसेसिंग और बच्चों के खेल का मेल है, जो 35,000 रुपये मासिक की अतिरिक्त राजस्व व्यवस्था भी चलाता है।
प्रमुख पहलें और उनका असर
| शहर/स्थान | मुख्य पहल | प्रमुख प्रभाव |
|---|---|---|
| रुद्रपुर | बायोगैस प्लांट & लेगेसी वेस्ट बायो-माइनिंग | 50 TPD क्षमता; डंपसाइट पार्क में बदला |
| मसूरी | बायो-मेथनेशन प्लांट | 8 TPD क्षमता; पर्यटन भार प्रबंधन |
| जोशीमठ | MRF | 1 करोड़+ राजस्व; दोगुनी आय |
| बागेश्वर | सखी SHG | महिलाओं द्वारा डोर-टू-डोर मॉडल |
| हल्द्वानी | बैणी सेना | यूज़र चार्ज 6 लाख से 32 लाख |
| केदारनाथ | डिजिटल रिफंड (QR) | 20 लाख बोतलें रीसाइकिल |
Amitendra Sharma is a digital news editor and media professional with a strong focus on credible journalism, public-interest reporting, and real-time news coverage. He actively works on delivering accurate, fact-checked, and reader-centric news related to Uttarakhand, governance, weather updates, and socio-political developments.