धराली आपदा के बाद मातम में उमड़ती आँसुओं की नदी… और धामी के रूप में पहुंचा बेटा उस मां, बहन और बेटी के पास

धराली की गलियों में मातम पसरा था।
कोई ज़ोर से रो नहीं रहा था, फिर भी हर दीवार चीख रही थी।
मलबों के बीच खड़े वो चेहरे कुछ कह नहीं रहे थे,
लेकिन उनकी आंखें — एक-एक शब्द बोल रही थीं —
दर्द, भय, लाचारी… और इंतज़ार।

इन्हीं टूटे दिलों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहुंचे।

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भीड़ ने उन्हें घेरा नहीं —
बस चुपचाप, सिसकियों के साथ उनकी ओर खिंचती चली गई।
महिलाएं आगे आईं…
किसी की साड़ी भीगी थी आंसुओं से,
किसी की थरथराती हथेलियां कांपती आवाज़ से भी ज़्यादा कुछ कह रही थीं।

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उन्होंने कुछ नहीं कहा —
बस मुख्यमंत्री के पास आकर फूट-फूटकर रोने लगीं।

मुख्यमंत्री की आंखें भी भीग गईं।
वो चुपचाप हर पीड़ित की आंखों में झांकते रहे —
जैसे वहाँ शब्दों की नहीं,

एक सच्ची संवेदना की ज़रूरत थी।

कभी किसी का हाथ थामा,
कभी किसी के सिर पर हाथ रखा,
तो कभी किसी पीड़ित बहन की आंखों से टपकते आंसू अपने रूमाल से पोंछ दिए।

उनके पास भाषण नहीं थे, वादे नहीं थे —
बस एक मौन था,
एक मौन जो कह रहा था —
“आप अकेली नहीं हैं… जब तक साँस है, मैं आपके साथ हूँ।”

मुख्यमंत्री के इस सान्निध्य में
कई आंखों से बरसों से रुके आंसू बह चले —
जैसे दर्द को कोई कंधा मिल गया हो,
जैसे दुख ने पहली बार सुना गया हो।

उनका सिर झुकाना,
हर मां की आंखों में झांककर चुपचाप आश्वस्त करना,
हर बेटी का हाथ थामकर कहना —
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ।”
यही बता रहा था कि इस आपदा में सरकार नहीं,
एक इंसान खड़ा है — पूरी ताक़त, संवेदना और भरोसे के साथ।

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