नेपाल की राजनीति इन दिनों एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। नई पीढ़ी, जिसे Gen-Z कहा जाता है, ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह बदलने का बीड़ा उठाया है। हाल ही में हुए हिंसक प्रदर्शनों और बड़े पैमाने पर हुए विरोधों ने न केवल तत्कालीन सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया, बल्कि एक नए संविधान और राजनीतिक ढांचे की मांग को भी जन्म दे दिया।
इन आंदोलनों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें पारंपरिक दलों ने नहीं, बल्कि Gen-Z युवाओं ने सोशल मीडिया और सड़कों पर खड़े होकर लीड किया।
हिंदू राष्ट्र की वापसी 🚩
2008 में नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया था, लेकिन Gen-Z आंदोलनकारियों ने अब हिंदू राष्ट्र की वापसी को केंद्रीय मुद्दा बना दिया है। उनका कहना है कि धर्मनिरपेक्षता ने भ्रष्टाचार और अस्थिरता को जन्म दिया है। वे मानते हैं कि हिंदू राष्ट्र बनने से नेपाल की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी और समाज में एकता आएगी।
प्रत्यक्ष-निर्वाचित कार्यकारी प्रमुख की मांग
नेपाल की मौजूदा संसदीय व्यवस्था ने पिछले 17 वर्षों में 14 प्रधानमंत्रियों को देखा है। Gen-Z का मानना है कि यह अस्थिरता इसलिए है क्योंकि प्रधानमंत्री को अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है। आंदोलनकारी चाहते हैं कि जनता सीधे कार्यकारी प्रमुख का चुनाव करे, ताकि जवाबदेही बढ़े और सरकार स्थिर हो।
प्रधानमंत्री के लिए दो कार्यकाल की सीमा
Gen-Z युवाओं ने प्रधानमंत्री पद के लिए दो कार्यकाल की सीमा (2-term cap) की मांग रखी है। उनका कहना है कि इससे राजनीतिक परिवारवाद और सत्ता का केंद्रीकरण टूटेगा और नए नेताओं के लिए अवसर खुलेंगे।
प्रांतों को खत्म करना और पूर्व नेताओं की गिरफ्तारी
2015 में बना संघीय ढांचा Gen-Z के मुताबिक असफल साबित हुआ है। उनका मानना है कि प्रांत केवल भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची बढ़ाने का जरिया हैं। इसलिए वे प्रांतों को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।
इसके साथ ही वे उन पूर्व नेताओं की गिरफ्तारी और संपत्ति जब्ती चाहते हैं, जो बड़े घोटालों और राजनीतिक हत्याओं में शामिल रहे हैं।
नेपाल अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सेना प्रमुख ने संयम बरतने की अपील की है, जबकि राजनीतिक दल इस आंदोलन को लेकर दुविधा में हैं। लेकिन इतना तय है कि Gen-Z की यह क्रांति सिर्फ सरकार बदलने तक सीमित नहीं है—यह पूरे सिस्टम को बदलने की पुकार है।
अब सवाल यह है कि क्या यह क्रांति नेपाल को स्थिर और जवाबदेह भविष्य दे पाएगी या यह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज एक और राजनीतिक उथल-पुथल बनकर रह जाएगी।
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