प्रयागराज महाकुंभ—जहां मोक्ष की आस में लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं, जहां पुण्य की डुबकी लगाने की लालसा उन्हें हर कठिनाई सहने के लिए तैयार कर देती है, वही महाकुंभ अब “लूटकुंभ” बन चुका है। शासन-प्रशासन की नाक के नीचे संगठित लूट मची है, लेकिन कोई कुछ करने को तैयार नहीं।

संगम तक पहुंचने की अग्निपरीक्षा, फिर लूट की बलि
ये श्रद्धालु कौन हैं? ये वे लोग हैं जो सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर से, ठंड और धूप की मार सहकर, घंटों-घंटों जाम में फंसे रहने के बाद किसी तरह प्रयागराज पहुंच रहे हैं। वे कई किलोमीटर पैदल चलकर, भीड़ की धक्कामुक्की सहकर, प्रशासनिक अव्यवस्थाओं से जूझते हुए, सिर्फ इस आस में आगे बढ़ते हैं कि वे संगम में पुण्य की डुबकी लगा सकें।
लेकिन जब वे किसी तरह प्रयागराज पहुंचते हैं, तो क्या मिलता है?
➡️ 75 रुपए की नाव 15,000 में – सरकार के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए नाविक खुलेआम श्रद्धालुओं से हजारों रुपए वसूल रहे हैं। देखें वीडियो कैसे श्रद्धालु प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं
➡️ 1,500 के कमरे 25,000 में – होटल मालिकों ने श्रद्धालुओं की मजबूरी को लूटने का मौका बना लिया है।
➡️ भोजन और पानी तक महंगा – 20 रुपए की पानी की बोतल 100 में, 100 रुपए का साधारण खाना 500 में मिल रहा है।
कई श्रद्धालु ऐसे हैं जिन्होंने जीवनभर की बचत से इस महायात्रा की योजना बनाई थी। वे सड़क किनारे, खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं क्योंकि होटल के दाम उनकी पहुंच से बाहर हैं। कोई संगम तक जाने का किराया नहीं जुटा पा रहा, तो कोई ठंड में ठिठुरता हुआ भूखा-प्यासा इधर-उधर भटक रहा है। क्या यही है योगी सरकार की व्यवस्थाएं?
क्या आस्था सिर्फ अमीरों के लिए रह गई है?
महाकुंभ का इतिहास गवाह है कि यहां राजा और रंक एक साथ स्नान करते थे। लेकिन अब यह आयोजन केवल पैसे वालों का खेल बन चुका है।
- जो श्रद्धालु जीवनभर बचत करके संगम स्नान का सपना देखते थे, वे अब नाव का किराया तक नहीं चुका पा रहे।
- जो लोग धर्मशालाओं में ठहरने की उम्मीद रखते थे, वे अब फुटपाथों और अस्थायी शिविरों में रात गुजारने को मजबूर हैं।
- जो लोग पुण्य लाभ कमाने आए थे, वे यहां लूट का शिकार होकर लौट रहे हैं।
क्या सरकार को इस लूट की खबर नहीं?
योगी सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि यह महाकुंभ “अब तक का सबसे सुव्यवस्थित और भव्य आयोजन” होगा। लेकिन अगर यही व्यवस्था है, तो फिर अराजकता किसे कहते हैं?
✅ भ्रष्टाचार हर स्तर पर हावी
✅ अधिकारियों की निगरानी नाममात्र की
✅ शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं
✅ श्रद्धालुओं की आस्था का सरेआम मज़ाक
अगर सरकार को पता नहीं, तो यह उसकी नाकामी है। और अगर सरकार को पता है और वह चुप है, तो यह लूट में उसकी मिलीभगत साबित करता है।
सरकार कब तक आंखें मूंदे बैठेगी?
➡️ क्या संगम स्नान अब सिर्फ अमीरों के लिए रह गया है?
➡️ क्या गरीब और मध्यमवर्गीय श्रद्धालु अब सिर्फ तमाशबीन बनकर रह जाएंगे?
➡️ क्या उत्तर प्रदेश की सरकार इस संगठित लूट को रोकने की हिम्मत दिखाएगी या फिर इसे मौन समर्थन देती रहेगी?
अगर सरकार इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं करती, तो यह महाकुंभ इतिहास में “लूटकुंभ” के नाम से जाना जाएगा। आस्था के इस पर्व पर लगे इस कलंक को मिटा पाना फिर मुश्किल होगा। श्रद्धालु पुण्य कमाने आए थे, लेकिन यहां पापियों के शिकंजे में फंस गए। यह लूट किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हो सकती!
Amitendra Sharma is a digital news editor and media professional with a strong focus on credible journalism, public-interest reporting, and real-time news coverage. He actively works on delivering accurate, fact-checked, and reader-centric news related to Uttarakhand, governance, weather updates, and socio-political developments.