उत्तराखंड में आसमान से आफत बरसती रही, और ज़मीन पर प्रशासन नींद के लिहाफ में लिपटा रहा। देहरादून जिला प्रशासन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया की ताक़त उनके लिए सिर्फ़ दिखावे का ज़रिया है, न कि जनता तक सूचना पहुंचाने का माध्यम।
3 अगस्त की शाम मौसम विभाग ने ऑरेंज अलर्ट जारी किया। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र ने तुरंत जिलों को सतर्क रहने और उचित कार्रवाई करने को कहा। सोशल मीडिया पर हलचल शुरू हो गई—लोग सवाल पूछने लगे: क्या कल स्कूल बंद रहेंगे? क्या बच्चों की सुरक्षा को लेकर कोई निर्णय लिया गया है?

पर ज़िला प्रशासन का सोशल मीडिया ऐसा जैसे वो हिमालय की किसी गुफा में साधना कर रहा हो। कोई आदेश नहीं, कोई सूचना नहीं, कोई अपडेट नहीं।
4 अगस्त की सुबह, देहरादून में जब बारिश थमी नहीं और पानी घरों के आँगन में घुसने लगा, तब अभिभावक बच्चों को लेकर स्कूल पहुँचे। वहाँ जाकर पता चला—जिला प्रशासन ने स्कूलों की छुट्टी घोषित कर दी है, बच्चों को वापस ले जाएं।
हैरानी तब हुई जब ये आदेश जिला प्रशासन के किसी ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट पर नहीं मिला। लोग टेलीग्राम चैनल, ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम तक खंगालते रहे—पर वहाँ तो नील बटा सन्नाटा।

बाद में जब आदेश कहीं से घूमता-फिरता मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचा, तो पाया गया कि उस पर दिनांक 3 अगस्त दर्ज थी—जबकि पूरे राज्य को इसकी भनक तक 4 अगस्त की सुबह हुई।
ख़ास बात ये कि जब इस प्रकरण की जाँच की गई तो मुख्यमंत्री कार्यालय की सूचना टीम के आधिकारिक हैंडल पर स्पष्ट दिखा कि आदेश 4 अगस्त को सुबह जारी हुए, लेकिन ज़िला प्रशासन ने आदेश में पिछली तारीख यानी 3 अगस्त डालकर खुद को बचाने की चतुर कोशिश की।


प्रश्न उठता है — अगर आदेश 3 तारीख को ही बन गया था तो वह रातभर कहाँ सोया रहा? कौन सी तिज़ोरी में था जिसे सुबह सूरज के साथ बाहर निकाला गया?
यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, यह जनता के विश्वास के साथ मज़ाक है।
बच्चे भीगते रहे, माता-पिता परेशान होते रहे, और जिला प्रशासन अपनी नींद में आदेश बनाता और उसे पोस्ट करना “भूल” जाता है।
देहरादून जैसे संवेदनशील जिले में यह चूक नहीं, चूक की आड़ में मूक प्रशासन का उदाहरण है।
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