उत्तराखंड में Census 2027: क्या फाइलों में भरे जाएंगे ‘फर्जी आंकड़े’?

उत्तराखंड के दुर्गम पर्वतीय जिलों से एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जिसने शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। Census 2027 को लेकर जारी हालिया आदेश अब कर्मचारियों और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का बड़ा विषय बन चुके हैं। खासकर सीमांत जिला Pithoragarh जैसे इलाकों में इन आदेशों को लेकर भारी असंतोष देखा जा रहा है, क्योंकि कागजों में तैयार की गई योजना पहाड़ की जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

प्रशासनिक आदेशों के मुताबिक जनगणना कार्य में लगाए गए कर्मचारियों और सुपरवाइजरों को पहले अपनी नियमित ऑफिस या स्कूल ड्यूटी पूरी करनी होगी और उसके बाद बचने वाले समय में गांव-गांव जाकर हाउस लिस्टिंग और फिजिकल वेरिफिकेशन करना होगा। पहली नजर में यह निर्देश सामान्य प्रशासनिक आदेश जैसा लग सकता है, लेकिन जो लोग हिमालयी भूगोल और पहाड़ी जीवन की वास्तविक कठिनाइयों को जानते हैं, उनके लिए यह आदेश किसी ‘तुगलकी फरमान’ से कम नहीं माना जा रहा।

Census 2027

कागजों में आसान, जमीन पर असंभव

मैदानी क्षेत्रों में सर्वे करना और पहाड़ों में जनगणना करना दो बिल्कुल अलग परिस्थितियां हैं। पहाड़ी जिलों में एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचने में कई किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई, कच्चे रास्ते, जंगल और खराब मौसम जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई गांव ऐसे हैं जहां सड़क तक उपलब्ध नहीं है और कर्मचारियों को घंटों पैदल चलना पड़ता है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि कोई कर्मचारी सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक अपनी नियमित ड्यूटी निभाएगा, तो उसके बाद वह दूरस्थ गांवों तक जाकर वास्तविक भौतिक सत्यापन कैसे करेगा? पहाड़ों में सूरज जल्दी ढल जाता है और शाम के बाद आवाजाही कई इलाकों में जोखिम भरी हो जाती है। ऐसे में यह आदेश व्यवहारिक कम और दबाव आधारित ज्यादा दिखाई देता है।

क्या सही होंगे जनगणना के आंकड़े?

जनगणना केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह किसी राज्य और देश के भविष्य की आधारशिला होती है। विकास योजनाएं, सड़क, अस्पताल, स्कूल, राशन, बजट और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक काफी हद तक जनसंख्या आंकड़ों पर आधारित होते हैं। ऐसे में यदि डेटा ही गलत हो जाए, तो आने वाले वर्षों की योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

यही कारण है कि अब सबसे बड़ा सवाल डेटा की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि जब समय और संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे, तो कई स्थानों पर केवल अनुमान आधारित जानकारी भरने का दबाव बन सकता है। यदि भौतिक सत्यापन ठीक से नहीं हुआ, तो करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की जाने वाली जनगणना रिपोर्ट महज कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएगी।

कर्मचारियों पर बढ़ता मानसिक और शारीरिक दबाव

पहाड़ों में काम करने वाले कर्मचारियों की स्थिति को समझना भी जरूरी है। लगातार स्कूल या ऑफिस की ड्यूटी के बाद कई किलोमीटर पैदल चलकर गांवों में सर्वे करना आसान नहीं है। बरसात, ठंड, भूस्खलन और जंगली जानवरों का खतरा अलग से मौजूद रहता है।

स्थानीय स्तर पर यह चिंता भी सामने आ रही है कि प्रशासनिक लक्ष्य पूरे करने के दबाव में कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की अनदेखी की जा रही है। यदि किसी कर्मचारी के साथ दुर्गम क्षेत्र में कोई हादसा हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? यह सवाल भी अब धीरे-धीरे उठने लगा है।

क्या बढ़ेगी ‘कागजी खानापूर्ति’?

प्रशासनिक तंत्र में अक्सर देखा गया है कि जब लक्ष्य अत्यधिक कठिन या अव्यावहारिक हो जाता है, तो लोग “कागजी उपलब्धि” दिखाने की कोशिश करते हैं। यही डर अब जनगणना 2027 को लेकर भी सामने आ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फील्ड स्टाफ को पर्याप्त समय, संसाधन और अलग कार्ययोजना नहीं दी गई, तो कई जगह केवल फॉर्म भरने की औपचारिकता पूरी हो सकती है। इससे उत्तराखंड के वास्तविक जनसांख्यिकीय आंकड़े कभी सामने नहीं आ पाएंगे और भविष्य की योजनाएं भी गलत डेटा के आधार पर बन सकती हैं।

पहाड़ और मैदान के लिए एक जैसे नियम क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या मैदानों और पहाड़ों के लिए एक जैसी कार्यप्रणाली लागू करना उचित है? Uttarakhand जैसे पर्वतीय राज्य में प्रशासनिक योजनाएं हमेशा भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए।

पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी और बागेश्वर जैसे जिलों की परिस्थितियां मैदानी शहरों से पूरी तरह अलग हैं। यहां कई गांव आज भी सड़क और नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। ऐसे में जनगणना जैसे बड़े राष्ट्रीय कार्य के लिए विशेष रणनीति बनाना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों और कर्मचारियों की राय है कि जनगणना को “अतिरिक्त जिम्मेदारी” की तरह नहीं बल्कि “प्राथमिक राष्ट्रीय कार्य” के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए कुछ बड़े कदम उठाए जा सकते हैं:

  • जनगणना के मुख्य चरण के दौरान कर्मचारियों को नियमित विभागीय कार्यों से आंशिक या पूर्ण छूट दी जाए।
  • पर्वतीय जिलों के लिए अलग समयसीमा और विशेष कार्ययोजना बनाई जाए।
  • दुर्गम क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को अतिरिक्त भत्ता और सुरक्षा सहायता दी जाए।
  • फील्ड वेरिफिकेशन के लिए स्थानीय प्रशासन और ग्राम स्तर पर सहयोगी तंत्र तैयार किया जाए।
  • वास्तविक जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लक्ष्य तय किए जाएं।

अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती

जनगणना 2027 केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह आने वाले दशक की विकास नीति तय करने वाला आधार है। यदि शुरुआत में ही प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, तो भविष्य में पूरे डेटा की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।

अब निगाहें Office of the Registrar General & Census Commissioner, India, Government of Uttarakhand और जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या वे इन आदेशों की समीक्षा करेंगे या नहीं। साथ ही यह मांग भी तेज हो रही है कि Pushkar Singh Dhami स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप करें ताकि पहाड़ की वास्तविकता को समझते हुए व्यावहारिक समाधान निकाला जा सके।

उत्तराखण्ड में डिजिटल जनगणना-2027 की शुरुआत

यदि जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य को केवल कागजी लक्ष्य बनाकर चलाया गया, तो उसके परिणाम भी कागजी ही साबित होंगे। पहाड़ों की भौगोलिक कठिनाइयों को नजरअंदाज करके तैयार की गई योजनाएं न केवल कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं, बल्कि राज्य के भविष्य को भी गलत आंकड़ों की नींव पर खड़ा कर सकती हैं।

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों को समझने के लिए केवल फाइलों और रिपोर्टों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए जमीन की वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। क्योंकि पहाड़ में हर आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि कठिन जीवन की सच्चाई होता है।

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