घने जंगल, चरती भेड़ें और कांपती आवाज़ में मोबाइल की घंटी— यही वो क्षण था जब बिरदेव को पता चला कि वो अफ़सर बन गया है। UPSC 2024 में 551वीं रैंक पाकर उसने न सिर्फ़ अपनी क़िस्मत बदली, बल्कि अपने पूरे गांव और समाज के लिए उम्मीद की एक मिसाल बन गया।
भील समाज से आने वाले बिरदेव की कहानी सिर्फ़ एक सफलता नहीं, बल्कि एक संघर्ष, तपस्या और आत्मविश्वास की गाथा है। महाराष्ट्र के एक आदिवासी इलाके़ से ताल्लुक रखने वाले बिरदेव बचपन से ही अपने पिता के साथ भेड़-बकरियाँ चराते थे। पढ़ाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी, बिजली-पानी की किल्लत, किताबें कम और जिम्मेदारियाँ ज़्यादा— लेकिन इन सबके बीच एक सपना था: कुछ बड़ा करना, समाज को कुछ लौटाना।
बिरदेव की पढ़ाई पेड़ों की छाँव में, टपकती झोंपड़ी की छत के नीचे और ट्यूशन के बजाय यू-ट्यूब पर मुफ्त वीडियो देखकर हुई। खेतों में काम करते हुए, भेड़ों के साथ चलते हुए उसने संविधान के अनुच्छेद याद किए, भूगोल के नक्शे मन में उतारे और समाजशास्त्र को अपनी ज़िन्दगी में जिया।
“मैं जब भेड़ें चरा रहा था और दोस्त का फोन आया कि तू अफ़सर बन गया है, तो मेरी आंखें नम हो गईं। मुझे पापा का चेहरा याद आ गया जो हमेशा कहते थे— बेटा पढ़ ले, कुछ बन जा, हमारी तरह मत रह जाना।” – बिरदेव
बिरदेव की सफलता सिर्फ़ एक व्यक्तिगत विजय नहीं है, ये उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित साधनों के बावजूद असीमित सपने देखते हैं। UPSC जैसी परीक्षा जिसमें देशभर के लाखों अभ्यर्थी सालों की मेहनत के बाद भी सफल नहीं हो पाते, वहाँ एक चरवाहे का बेटा अफ़सर बन जाना भारतीय लोकतंत्र और शिक्षा की ताक़त को दर्शाता है।
गांव में जश्न का माहौल है, लोग बिरदेव को कंधों पर उठा रहे हैं, महिलाएं गीत गा रही हैं और बच्चे “हमारा बिरदेव अफ़सर बन गया” के नारे लगा रहे हैं। गाँव की मिट्टी से निकला यह हीरा अब प्रशासनिक सेवा में जाकर उसी मिट्टी को सम्मान देने की तैयारी में है।
यह कहानी हमें याद दिलाती है— सपने ऊँचाई नहीं देखते, हौसलों की गहराई पर फलते हैं।
