3 अगस्त 2025 को राजनीतिक गलियारों में उस वक़्त हलचल मच गई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फिर गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ ही घंटों के भीतर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाक़ात की। देखने में भले यह औपचारिक या ‘शिष्टाचार मुलाकात’ हो, लेकिन राजनीति में कुछ भी संयोग नहीं होता — ख़ासतौर पर तब जब केंद्र सरकार विपक्ष के चौतरफा दबाव में हो, संसद ठप हो, और अगले कुछ हफ्तों में उपराष्ट्रपति का चुनाव होने वाला हो।
🔍 समय और संदर्भ: यह सिर्फ़ “शिष्टाचार” नहीं
इन मुलाक़ातों का समय बेहद रणनीतिक है। संसद का मानसून सत्र गतिरोध की भेंट चढ़ा हुआ है। विपक्ष बिहार में मतदाता सूची से जुड़े SIR (Special Intensive Revision) पर बहस की मांग कर रहा है। सरकार बचाव में है, और संसदीय कामकाज बाधित हो चुका है।
ऐसे में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का राष्ट्रपति से मुलाक़ात करना अचानक नहीं हो सकता। यह एक उच्चस्तरीय संवाद का हिस्सा है, जो संवैधानिक लेकिन रणनीतिक है।
इससे पहले इसी तरह की मुलाक़ातें तब देखी गई थीं जब सरकार विपक्ष को चौंकाने वाले कदम उठाने वाली होती है — जैसे अनुच्छेद 370 हटाना, CAA लाना या कृषि कानून वापस लेना।
🧭 क्या राष्ट्रपति से यह संवाद एक संकेत है?
भारत की संसदीय राजनीति में राष्ट्रपति भले ही कार्यपालिका के सुझावों पर ही कार्य करता है, लेकिन संवैधानिक निर्णयों की मुहर उन्हीं के माध्यम से लगती है। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अलग-अलग जाकर उनसे मुलाकात करें, तो यह सामान्य प्रक्रिया से अधिक “संदेशों की राजनीति” लगती है।
विश्लेषकों की मानें तो ये संकेत हैं कि:
- सरकार संसद के गतिरोध से निकलने के लिए कोई बड़ा राजनीतिक या विधायी विकल्प तलाश रही है।
- विपक्ष को किनारे करने के लिए “प्रेसिडेंशियल रूट” यानी राष्ट्रपति की मुहर वाले अध्यादेश या सत्र स्थगन जैसे विकल्पों पर चर्चा हो रही हो सकती है।
- या फिर उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार को लेकर अंतिम मंथन हो रहा है।
🗳️ उपराष्ट्रपति चुनाव और सत्ता समीकरण
ध्यान देने वाली बात है कि कुछ दिन पहले ही उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों से पद से हटने की घोषणा की थी। नया उपराष्ट्रपति चुनने के लिए चुनाव की अधिसूचना जल्द जारी होनी है।
BJP के लिए यह मौका सिर्फ एक संवैधानिक पद भरने का नहीं, बल्कि 2026 के राज्यसभा समीकरणों पर पकड़ मजबूत करने का भी है। ऐसे में राष्ट्रपति के साथ सीधी बातचीत इस प्रक्रिया का रणनीतिक हिस्सा हो सकती है।
🇮🇳 क्या राष्ट्रपति भवन बन रहा है नई राजनीतिक धुरी?
जब सरकार संसद में सुनी नहीं जाती, और विपक्ष लगातार हमलावर हो, तब सत्ता राष्ट्रपति भवन के माध्यम से विकल्प खोजती है — यह भारत की समकालीन राजनीति में देखा गया है। 2019 के अनुच्छेद 370 संशोधन से लेकर 2020 के कोविड अध्यादेशों तक, जब भी सरकार संसद के भीतर से आश्वस्त नहीं होती, तो वह संवैधानिक रास्तों को पहले मजबूत करती है।
इस बार भी वही होता दिख रहा है।
🤝 मोदी-शाह का क्रमिक दौरा: साझा रणनीति, विभाजित भूमिकाएं?
एक और दिलचस्प पहलू यह है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने राष्ट्रपति से अलग-अलग समय पर मुलाकात की। यह भी दर्शाता है कि दोनों की ज़िम्मेदारियां स्पष्ट रूप से बंटी हुई हैं:
- मोदी बतौर प्रधानमंत्री एक समग्र राजनीतिक रिपोर्टिंग करते हैं
- जबकि शाह बतौर आंतरिक मामलों के रणनीतिकार, विशिष्ट सुरक्षा या विधायी प्रस्तावों पर बात रखते हैं
यह सिलसिला तब और अहम हो जाता है जब विपक्ष राष्ट्रपति से संसद सत्र को बाधित करने वाले कारणों की रिपोर्टिंग मांग सकता है — या राष्ट्रपति खुद विपक्ष को संवाद के लिए आमंत्रित कर सकती हैं।
राजनीति एक नई दिशा में मुड़ रही है
यह मुलाकातें सामान्य नहीं हैं। ये एक ‘संवैधानिक चेतावनी’ की तरह हैं — कि सरकार अब परंपरागत संसदीय प्रक्रिया से हटकर, संवैधानिक शक्ति-केन्द्रों को सक्रिय कर रही है। इससे साफ है कि आने वाले हफ्तों में कोई बड़ा विधायी या राजनीतिक कदम उठ सकता है — जैसे संसद का सत्र छोटा कर देना, अध्यादेश लाना या कोई नया बिल प्रस्तावित करना।
जो भी हो, इतना तय है कि दिल्ली में अब सियासत सिर्फ संसद भवन से नहीं, राष्ट्रपति भवन से भी तय होगी।

