परंपरा से परिवर्तन की ओर
भारतीय सैन्य इतिहास में 15 जनवरी का दिन केवल एक औपचारिक तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता, अनुशासन और बलिदान की जीवंत स्मृति है। वर्ष 1949 में लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. करियप्पा द्वारा भारतीय सेना की कमान संभालने के साथ सेना दिवस की परंपरा शुरू हुई थी। समय के साथ यह आयोजन केवल सैन्य परेड तक सीमित न रहकर, भारत की रणनीतिक सोच, तकनीकी आत्मनिर्भरता और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक बन गया है। इसी क्रम में 78वां सेना दिवस जयपुर में मनाया जाना केवल आयोजन स्थल का परिवर्तन नहीं, बल्कि सैन्य परंपरा के लोकतंत्रीकरण का स्पष्ट संकेत है।

जयपुर में ऐतिहासिक आयोजन: पहली बार असैन्य क्षेत्र
राजस्थान की राजधानी जयपुर के जगतपुरा स्थित महल रोड पर आयोजित सेना दिवस परेड ने कई मायनों में इतिहास रच दिया। यह पहली बार था जब सेना दिवस परेड किसी असैन्य क्षेत्र में आयोजित हुई। इससे पहले दिल्ली से बाहर यह आयोजन केवल सीमित सैन्य छावनियों तक ही सीमित रहा था। जयपुर को इस आयोजन की मेजबानी मिलना न केवल राजस्थान के लिए गौरव का विषय है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि सेना अब सीधे समाज के बीच संवाद स्थापित कर रही है।
इस भव्य आयोजन में भारतीय सेना की परंपरा, अनुशासन और आधुनिक क्षमताएं एक साथ दृष्टिगोचर हुईं। परेड का निरीक्षण थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया, जबकि मंच पर राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, मिजोरम के राज्यपाल जनरल (सेवानिवृत्त) वी.के. सिंह और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान की गरिमामयी उपस्थिति रही।

स्वदेशी शक्ति का प्रदर्शन: आत्मनिर्भर भारत का सैन्य चेहरा
इस वर्ष की थीम ‘भारतीय सेना–शौर्य और बलिदान’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि परेड का केंद्रीय भाव था। सेना दिवस परेड में स्वदेशी रक्षा उत्पादन और नई तकनीकों का व्यापक प्रदर्शन किया गया। ब्रह्मोस मिसाइल, अर्जुन और भीष्म टैंक, के-9 वज्र तोप, पिनाका रॉकेट सिस्टम, नाग मिसाइल प्रणाली, ड्रोन शक्ति और ड्रोन जैमर तकनीक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय सेना अब आयात-आधारित नहीं, बल्कि नवाचार-आधारित शक्ति बन चुकी है।
विशेष रूप से रोबोटिक म्यूल, स्वाथी वेपन लोकेटिंग रडार, मॉड्यूलर ब्रिजिंग सिस्टम और मोबाइल कम्युनिकेशन नोड जैसी प्रणालियों ने भविष्य के युद्ध परिदृश्य की झलक प्रस्तुत की। यह प्रदर्शन केवल हथियारों की प्रदर्शनी नहीं था, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता का सार्वजनिक प्रमाण था।

मानवीय साहस और सम्मान: वीरता का स्मरण
सेना दिवस का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया जब ऑपरेशन ‘सिंदूर’ सहित विभिन्न अभियानों में अदम्य साहस का परिचय देने वाले पांच शूरवीरों—सूबेदार मेजर पवन कुमार, हवलदार सुनील कुमार सिंह, लांस नायक दिनेश कुमार, लांस नायक सुभाष कुमार और लांस नायक प्रदीप कुमार—को मरणोपरांत सेना मेडल (गैलेंट्री) से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल व्यक्तिगत वीरता का नहीं, बल्कि उस मूल्य प्रणाली का प्रतीक है जिस पर भारतीय सेना खड़ी है।

सांस्कृतिक जुड़ाव और सामाजिक संदेश
जयपुर में आयोजित सेना दिवस परेड ने यह भी सिद्ध किया कि सेना और संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। राजस्थान की कच्छी घोड़ी, गैर, कालबेलिया और दंगल जैसे लोकनृत्यों के साथ भरतपुर की फूलों की होली की झांकियों ने आयोजन को जन-संवेदनाओं से जोड़ा। नेपाल आर्मी बैंड की भागीदारी ने भारत-नेपाल के ऐतिहासिक सैन्य संबंधों को रेखांकित किया, जबकि गर्ल्स एनसीसी टुकड़ी की मार्च पास्ट ने सेना में महिलाओं की बढ़ती भूमिका का सशक्त संदेश दिया।

आकाश से धरती तक: शक्ति का समन्वित प्रदर्शन
तीन चेतक हेलीकॉप्टरों द्वारा तिरंगे और संयुक्त सेनाध्वज के साथ पुष्पवर्षा, अपाचे हेलीकॉप्टरों की फॉर्मेशन फ्लाइट और नाल एयरबेस से आए जगुआर लड़ाकू विमानों की गर्जना ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की सैन्य शक्ति केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि बहु-आयामी और समन्वित है। पैराट्रूपर्स के साहसिक करतब और सेना सेवा कोर के बाइक्स पर संतुलन प्रदर्शन ने युवाओं में विशेष उत्साह पैदा किया।
आंकड़े और तथ्य
प्रमुख तथ्य
- सेना दिवस की शुरुआत: 15 जनवरी 1949
- जयपुर में आयोजन: 78वां सेना दिवस
- दिल्ली के बाहर आयोजन: चौथी बार
- असैन्य क्षेत्र में परेड: पहली बार
- परेड में भाग लेने वाली रेजीमेंट्स: 7
भविष्य की दिशा
जयपुर में आयोजित 78वां सेना दिवस केवल एक समारोह नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और सैन्य परंपरा के बीच बढ़ते विश्वास का प्रतीक है। असैन्य क्षेत्र में परेड का आयोजन यह संकेत देता है कि सेना स्वयं को जनता से अलग नहीं, बल्कि उसी का अभिन्न अंग मानती है। आने वाले वर्षों में यदि ऐसे आयोजन देश के विभिन्न हिस्सों में होते हैं, तो यह न केवल सैन्य-सामाजिक दूरी को कम करेगा, बल्कि युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित भी करेगा। सेना दिवस अब केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि संवाद और दिशा निर्धारण का मंच बनता जा रहा है।