एक सोच, जिसने देश की दिशा बदली
जिस बेटी को कभी समाज में बचाने और बचाए रखने की बात होती थी, आज वही बेटी भारत की पहचान बन चुकी है।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान को शुरू हुए आज 11 वर्ष पूरे हो चुके हैं और यह अवधि इस बात की गवाही देती है कि जब नीति, समाज और संकल्प एक दिशा में चलते हैं, तो परिवर्तन केवल काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर दिखता है।
यह अभियान सिर्फ एक सरकारी पहल नहीं रहा, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रतीक बन गया है।
शास्त्रों से आधुनिक भारत तक: कन्या का शाश्वत महत्व
भारतीय परंपरा ने कन्या के महत्व को सदियों पहले स्पष्ट कर दिया था—
दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्।
यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥
अर्थात—
एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है, और जो फल दस पुत्रों से मिलता है, वही एक कन्या से भी प्राप्त होता है।
आज का भारत इस श्लोक को व्यवहार में साकार होते हुए देख रहा है।
अभियान की शुरुआत: जब देश ने सामूहिक संकल्प लिया
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शुरुआत 22 जनवरी 2015 को हुई थी।
उस समय देश के कई हिस्सों में—
- गिरता लैंगिक अनुपात
- बालिका शिक्षा में कमी
- कन्या भ्रूण-हत्या जैसी गंभीर चुनौतियाँ
स्पष्ट चेतावनी दे रही थीं कि अब नीतिगत हस्तक्षेप ज़रूरी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान: बदलाव की पुष्टि
अभियान की 11वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान जारी करते हुए कहा कि—
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ आज केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि देश की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन चुका है।”
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत की बेटियों ने यह साबित कर दिया है कि समान अवसर और विश्वास मिलने पर वे हर क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करती हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में नारी शक्ति की भूमिका निर्णायक होगी।
11 साल बाद की तस्वीर: बदलता हुआ भारत
आज भारत की बेटियां—
- खेल जगत में ओलंपिक और विश्व मंच पर तिरंगा लहरा रही हैं
- विज्ञान और तकनीक में नई खोजों का नेतृत्व कर रही हैं
- सेना, अंतरिक्ष और प्रशासन में अग्रिम पंक्ति में हैं
- शिक्षा, स्टार्टअप और नेतृत्व में नई पहचान बना रही हैं
यह बदलाव सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमता के विस्तार का संकेत है।
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सामाजिक और नीतिगत प्रभाव
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के चलते—
- कई जिलों में जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार
- बालिकाओं के स्कूल नामांकन में वृद्धि
- उच्च शिक्षा में बेटियों की भागीदारी बढ़ी
- समाज में कन्या भ्रूण-हत्या के प्रति अस्वीकार्यता मजबूत हुई
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह परिवर्तन लगातार संवाद, नीति और सामाजिक भागीदारी का परिणाम है।
विकसित भारत@2047 और बेटियों की भूमिका
सरकार का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि—
- महिला सशक्तिकरण के बिना विकास अधूरा
- शिक्षा के बिना समानता असंभव
- सम्मान के बिना सशक्तिकरण खोखला
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ने इन मूल्यों को नीतिगत आधार दिया है।
अब भी चुनौतियाँ हैं, लेकिन दिशा स्पष्ट है
हालाँकि उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं, फिर भी—
- कुछ क्षेत्रों में सामाजिक रूढ़ियाँ
- शिक्षा के बाद रोजगार में असमानता
- सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे
अब अगला चरण होना चाहिए—
शिक्षा से नेतृत्व तक।
निष्कर्ष: गर्व की यात्रा, साझा जिम्मेदारी
11 साल की यह यात्रा बताती है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ केवल एक योजना नहीं, बल्कि भारत की सोच में आया बदलाव है।
आज भारत की बेटियां केवल भविष्य नहीं हैं—
वे वर्तमान की ताकत बन चुकी हैं।
यह गर्व का क्षण है,
और साथ ही यह याद दिलाने वाला भी कि यह यात्रा अभी जारी है।
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