नई दिल्ली | 27 जून 2025
देश की राजनीति में एक नया संवैधानिक भूचाल खड़ा हो गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज एक बड़ी मांग करते हुए कहा कि भारतीय संविधान से ‘धर्मनिरपेक्षता’ (Secularism) शब्द को हटाया जाना चाहिए। उन्होंने इसे भारत की मूल संस्कृति के खिलाफ बताया और कहा कि यह शब्द “हमारी सभ्यता का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बल्कि इमरजेंसी के दौरान जबरन जोड़ा गया था।”
“भारत की आत्मा सर्वधर्म समभाव है। सभी धर्मों का सम्मान हमारी परंपरा रही है। हमें सेक्युलरिज़्म का नकाब पहनाने की ज़रूरत नहीं।” – शिवराज सिंह चौहान
🏛️ संविधान और ‘Secularism’ की कहानी
भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना (Preamble) में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द नहीं था।
1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के जरिए आपातकाल के दौरान ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द जोड़े थे। इसके बाद से यह बहस कई बार उठ चुकी है कि क्या ये शब्द भारत की आत्मा के अनुरूप हैं या किसी खास वैचारिक एजेंडे के तहत थोपे गए थे।
🔥 शिवराज का बयान क्यों है अहम?
- शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता हैं और उनका यह बयान सरकारी नीति की संभावित दिशा को इंगित करता है।
- उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि “धर्मनिरपेक्षता भारत की आत्मा नहीं है, बल्कि ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ जैसे श्लोक हमारी सोच को परिभाषित करते हैं।”
- उन्होंने यह भी कहा कि भारत की संस्कृति सभी विचारों को अपनाने वाली रही है, न कि किसी एक धर्म के विरोध में खड़ी होने वाली।
🗳️ RSS और सरकार की सोच में मेल
- शिवराज का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने भी यही मांग की थी – कि संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द हटाए जाने चाहिए।
- इसके बाद केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी समर्थन दिया और कहा कि यह समय है “संविधान को उसकी मौलिक आत्मा” में वापस लाने का।
⚔️ विपक्ष का तीखा हमला
- राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“BJP और RSS संविधान नहीं, मनुस्मृति चाहते हैं। ये ‘संविधान की हत्या’ की कोशिश है।”
- कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि यह भारत के लोकतांत्रिक और बहुलतावादी मूल्यों पर हमला है।
🤔 क्या ये सिर्फ शब्द हैं या विचारधारा की लड़ाई?
यह बहस सिर्फ ‘Secularism’ शब्द तक सीमित नहीं। यह भारत की विचारधारा की उस गहराई को छूती है जहां एक ओर सर्वधर्म समभाव है और दूसरी ओर राज्य द्वारा धार्मिक तटस्थता की कानूनी गारंटी।
अब बड़ा सवाल ये है —
क्या ‘Secularism’ को हटाने का मतलब भारत के चरित्र को बदलना होगा, या यह महज़ एक वैचारिक सुधार होगा?
📌 आगे क्या?
अगर सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है तो इसके लिए संविधान संशोधन की ज़रूरत होगी, जिसमें संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कई राज्यों की सहमति चाहिए।
यह सिर्फ एक बयान नहीं, आने वाले समय में संविधान, चुनाव, और भारत की पहचान पर एक बड़ा विमर्श खड़ा कर सकता है।
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