✍️ लेखक
राजेन्द्र मोहन शर्मा
वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद् और चिन्तक
संकल्प से सिद्धि तक
भारतीय संविधान का निर्माण केवल कानूनी अनुच्छेदों का संकलन नहीं था, बल्कि यह सदियों की दासता के विरुद्ध भारतीय मेधा, संघर्ष और अटूट संकल्प की महागाथा थी।
सन् 1946 से 1950 के बीच का कालखंड भारतीय इतिहास का वह निर्णायक संधिकाल था, जहाँ एक ओर ढहते हुए ब्रिटिश साम्राज्य की कुटिल कूटनीति थी, तो दूसरी ओर एक अखंड, संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण का भारतीय स्वप्न।

तीन ऐतिहासिक धाराओं के माध्यम से यह लेख भारत के गणतंत्र बनने की उस यात्रा को देखता है—
जो कैबिनेट मिशन की विभाजनकारी साजिशों को विफल करने से शुरू होती है,
1930 के ‘पूर्ण स्वराज’ के अधूरे संकल्प को पूर्ण करती है
और अंततः संविधान सभा के उस बौद्धिक महायज्ञ में परिणत होती है,
जहाँ “हम भारत के लोग” सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित हुए।
नीले सपने: जब साहित्यकार की कलम ‘सिस्टम’ की नब्ज टटोलती है
🌑 कैबिनेट मिशन की छाया और संकल्प की ज्योति
सन् 1946 की वसंत ऋतु भारतीय इतिहास में अनिश्चितता और आशा का संगम थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्य की कमर तोड़ दी थी। लंदन की लेबर सरकार यह समझ चुकी थी कि भारत पर सीधा शासन अब संभव नहीं, किंतु उनकी मंशा भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में छोड़ने की भी नहीं थी।
24 मार्च 1946 को ‘कैबिनेट मिशन’ भारत पहुँचा—
लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर के नेतृत्व में।
शांति का मुखौटा ओढ़े इस मिशन की योजना दरअसल भारत की अखंडता के लिए एक संवैधानिक जाल थी।
‘ग्रुपिंग’ योजना के तहत प्रांतों को तीन वर्गों में बाँटकर केंद्र को कमजोर करने का प्रयास किया गया।
यह “फूट डालो और राज करो” की आधुनिक संवैधानिक व्याख्या थी।

परंतु ब्रिटिश भारतीय नेतृत्व के संकल्प को कम आँक बैठे थे।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कहा—समूहीकरण अनिवार्य नहीं, स्वैच्छिक होगा।
भारतीय एकता से कोई समझौता नहीं।
मुस्लिम लीग के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ ने हिंसा को जन्म दिया, पर भारतीय नेतृत्व विचलित नहीं हुआ।
संविधान सभा के चुनाव हुए, डॉ. अंबेडकर जैसे मनीषी आगे आए और
अंततः कैबिनेट मिशन की साजिश इतिहास के कूड़ेदान में चली गई।
26 जनवरी 1950 को जब भारत गणतंत्र बना,
तो यह भारतीय संकल्प की ब्रिटिश कूटनीति पर विजय थी।
🔥 पूर्ण स्वराज की पुकार और गणतंत्र की पूर्ति
दिसंबर 1929—
लाहौर, रावी नदी का तट और कांग्रेस अधिवेशन।
युवा जवाहरलाल नेहरू ने ‘पूर्ण स्वराज’ का उद्घोष किया।
26 जनवरी 1930 को तिरंगा फहराया गया।
लाखों भारतीयों ने स्वतंत्रता का संकल्प लिया।
ब्रिटिशों ने गोलमेज सम्मेलन, 1935 का अधिनियम और युद्ध की चालें चलीं।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उस जनसंकल्प का विस्फोट था।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली, पर वह अधूरी थी—
भारत अभी भी डोमिनियन था।
संविधान सभा ने इस अधूरेपन को समाप्त करने का बीड़ा उठाया।
डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में ऐसा संविधान बना जो समानता, न्याय और गरिमा पर आधारित था।
सरदार पटेल ने रियासतों का विलय कर भारत को पूर्ण रूप दिया।
26 नवंबर 1949 को संविधान पूर्ण हुआ
और 26 जनवरी 1950 को—
1930 के ‘पूर्ण स्वराज’ की पुकार को ऐतिहासिक सम्मान मिला।
🏛️ संविधान सभा और ब्रिटिश छाया का अंत
1946 में गठित संविधान सभा से ब्रिटिशों को उम्मीद थी कि वे पर्दे के पीछे नियंत्रण रख पाएंगे।
लेकिन 9 दिसंबर 1946 की पहली बैठक ने दिशा तय कर दी।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने।
13 दिसंबर को नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव आया—
भारत होगा एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य।
डॉ. अंबेडकर ने ब्रिटिश ढांचे में भारतीय आत्मा फूँकी।
मौलिक अधिकार, समानता, अस्पृश्यता का अंत—
ये सब ब्रिटिश नीति पर सीधा प्रहार थे।
2 वर्ष 11 महीने 18 दिन के अथक परिश्रम के बाद
26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकार हुआ।
26 जनवरी 1950—
भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र बना।
शक्ति ब्रिटिश ताज से निकलकर
“हम भारत के लोग” के हाथों में आई।
गणतंत्र का शाश्वत संकल्प
यह केवल इतिहास नहीं,
यह उस भारतीय चेतना की कहानी है जिसने
षड्यंत्रों, विभाजन और दबावों को परास्त किया।
आज भी हर गणतंत्र दिवस
उसी अडिग संकल्प की
गौरवगाथा सुनाता है।
