नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट डेस्क
देश की उच्च शिक्षा नीति को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णायक और चेतावनी भरा हस्तक्षेप किया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने UGC Equality Regulations 2026 पर तत्काल अंतरिम रोक लगाते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा—
“अगर अदालत ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे और समाज में विभाजन पैदा होगा।”
यह टिप्पणी केवल एक कानूनी अवलोकन नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं और शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर संकेत के रूप में देखी जा रही है।
⚖️ क्या हैं UGC Equality Regulations 2026?
13 जनवरी 2026 को अधिसूचित
University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026
का घोषित उद्देश्य था—
- उच्च शिक्षा संस्थानों में
- जाति
- धर्म
- लिंग
- जन्म स्थान
- विकलांगता
के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना।
इन नियमों के तहत
- Equal Opportunity Centre
- Equity Committee
की स्थापना अनिवार्य की गई थी।
🚨 विवाद की जड़: धारा 3(सी) बनाम धारा 3(ई)
सुप्रीम कोर्ट ने नियमों की दो धाराओं में सीधा टकराव पाया।
📌 धारा 3(सी)
“जाति आधारित भेदभाव” को केवल
SC/ST/OBC के विरुद्ध सीमित करती है।
📌 धारा 3(ई)
“भेदभाव” की परिभाषा को
किसी भी हितधारक तक विस्तारित करती है—
चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो।
👨⚖️ CJI सूर्यकांत का तीखा सवाल:
“जब धारा 3(ई) पहले से मौजूद है, तो 3(सी) को अलग से क्यों लाया गया?
क्या यह भेदभाव के भीतर भेदभाव नहीं है?”
BIG BREAKING: UGC के नए नियमों पर देशभर में बवाल, भारी विरोध के बाद केंद्र सरकार का बड़ा फैसला
🧑⚖️ याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि—
- सामान्य वर्ग के छात्रों को
- शिकायत निवारण
- संस्थागत संरक्षण
से बाहर कर दिया गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु जैन ने कहा—
“यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
यह मान लेना कि भेदभाव केवल एक वर्ग के खिलाफ हो सकता है, संवैधानिक रूप से गलत है।”
🗣️ कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ

🔴 CJI सूर्यकांत:
“75 साल बाद भी क्या हम समाज को वर्गहीन नहीं बना पाए?
क्या हम फिर से प्रतिगामी सोच की ओर बढ़ रहे हैं?”
🔴 जस्टिस बागची:
“प्रगतिशील कानून में प्रतिगामी रुख क्यों?
हमें अलग-अलग छात्रावासों और वर्गों की ओर नहीं जाना चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी चेताया कि
इस तरह के नियमों का दुरुपयोग संभव है।
📑 सुप्रीम कोर्ट का आदेश (Official)
✔️ UGC और केंद्र सरकार को नोटिस
✔️ 19 मार्च 2026 तक जवाब
✔️ संबंधित याचिकाओं को 2019 के संवैधानिक मामलों से टैग
✔️ UGC Equality Regulations 2026 पर अंतरिम रोक
कोर्ट ने कहा कि
“नियमों की भाषा अस्पष्ट है और विशेषज्ञों द्वारा इसकी समीक्षा जरूरी है।”
🔍 अदालत के बाहर माहौल
नियमों को लेकर
- उच्च जाति वर्गों में विरोध
- “एकतरफा नियम” के आरोप
- शिक्षा परिसरों में संभावित तनाव की आशंका
भी सामने आने लगी है।
🧠 Editor’s Take | Headlinesip Analysis
सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दे दिया है कि
समानता के नाम पर चयनात्मक संरक्षण
संवैधानिक कसौटी पर टिक नहीं पाएगा।
यह मामला
- शिक्षा नीति
- सामाजिक संतुलन
- और संविधान की मूल भावना
तीनों के लिए टेस्ट केस बन चुका है।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप केवल यूजीसी समानता नियम 2026 पर कानूनी रोक भर नहीं है, बल्कि यह देश की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संतुलन को लेकर एक गहरी चेतावनी भी है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि समानता का उद्देश्य किसी एक वर्ग को संरक्षण देना नहीं, बल्कि हर नागरिक को समान अधिकार और न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए। यदि नीतियां अस्पष्ट भाषा और चयनात्मक ढांचे पर आधारित होंगी, तो उनका दुरुपयोग और समाज में विभाजन तय है। अब यह केंद्र सरकार और यूजीसी की जिम्मेदारी है कि वे विशेषज्ञों की सलाह से ऐसे नियम तैयार करें, जो वास्तव में समावेशी हों और संविधान की मूल भावना को मजबूत करें।
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