जम्मू-कश्मीर में मुठभेड़, उत्तराखंड के सपूत ने दिखाया अदम्य साहस
देवभूमि उत्तराखंड की धरती एक बार फिर अपने वीर सपूत के बलिदान से गमगीन है। बागेश्वर जनपद निवासी हवलदार श्री गजेन्द्र सिंह गढ़िया जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के सिंहपोरा क्षेत्र में आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में शहीद हो गए।
ड्यूटी के दौरान सामने आए इस आतंकी हमले में उन्होंने आखिरी सांस तक मोर्चा संभाले रखा। उनका यह बलिदान न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व और पीड़ा — दोनों का कारण बन गया है।
सिंहपोरा में क्या हुआ: ऑपरेशन के दौरान बिगड़ी स्थिति
सूत्रों के मुताबिक, किश्तवाड़ के सिंहपोरा इलाके में आतंकियों की मौजूदगी की पुख्ता सूचना पर सुरक्षा बलों द्वारा तलाशी अभियान चलाया जा रहा था। जैसे ही जवान इलाके में आगे बढ़े, छिपे आतंकवादियों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी।
इसी मुठभेड़ में उत्तराखंड शहीद हवलदार गजेन्द्र सिंह गढ़िया गंभीर रूप से घायल हो गए। साथी जवानों ने तुरंत उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, लेकिन इलाज के दौरान उन्होंने वीरगति प्राप्त कर ली।
सेना ने स्पष्ट किया है कि ऑपरेशन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और इलाके में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।
बागेश्वर में पसरा मातम, गांव की आंखें नम
जैसे ही शहादत की खबर बागेश्वर पहुंची, पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। गांव में हर कोई स्तब्ध है — कोई यकीन नहीं कर पा रहा कि जिस बेटे पर सबको गर्व था, वह अब तिरंगे में लिपटकर लौटेगा।
परिवार के करीबी लोगों का कहना है कि गजेन्द्र सिंह गढ़िया बेहद शांत, अनुशासित और देशसेवा को सर्वोपरि मानने वाले व्यक्ति थे। सेना में रहकर देश की रक्षा करना उनके लिए सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य था।

सेना और राज्य का संदेश: बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा
भारतीय सेना ने अपने बयान में कहा है कि हवलदार गजेन्द्र सिंह गढ़िया का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। आतंकियों के खिलाफ अभियान और तेज किया जाएगा।
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उत्तराखंड सरकार और जनप्रतिनिधियों ने भी शहीद को श्रद्धांजलि देते हुए परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। शहीद के पार्थिव शरीर को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव लाने की प्रक्रिया चल रही है।
उत्तराखंड को देश की “सैन्यभूमि” यूं ही नहीं कहा जाता। यहां लगभग हर परिवार की किसी न किसी पीढ़ी ने वर्दी पहनी है। उत्तराखंड शहीद हवलदार गजेन्द्र सिंह गढ़िया उसी गौरवशाली परंपरा की एक मजबूत कड़ी थे।
उनकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि देश की सुरक्षा की कीमत कितनी बड़ी होती है।।
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