उत्तराखंड की सर्दी जनवरी में ही विदा हो गई
उत्तराखंड में snowfall हमेशा सिर्फ मौसम की घटना नहीं रही, बल्कि यह पहाड़ के जीवन, जल, खेती और अर्थव्यवस्था की नींव रही है।
लेकिन जनवरी 2026 में वह नींव हिलती दिखाई दी। 1980 के दशक के मध्य के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि गढ़वाल हिमालय की कई ऊँची चोटियों पर जनवरी के पूरे महीने में लगभग snowfall नहीं हुआ।
Tungnath, चमोली और रुद्रप्रयाग की ऊँचाइयाँ—जहाँ आम तौर पर इस समय मोटी बर्फ की परत दिखती है—इस बार सूखी और भूरी नज़र आईं। यह दृश्य सिर्फ असामान्य नहीं, बल्कि खतरे की घंटी है।
मौसम विज्ञान क्या कहता है: पश्चिमी विक्षोभ क्यों नाकाम रहे
India Meteorological Department (IMD) के अनुसार उत्तराखंड में सर्दियों की बर्फबारी पूरी तरह पश्चिमी विक्षोभों पर निर्भर करती है।
जनवरी 2026 में समस्या यह नहीं थी कि विक्षोभ आए ही नहीं, बल्कि यह थी कि:
- वे कमजोर रहे
- पर्याप्त नमी नहीं ला पाए
- या उत्तराखंड को छुए बिना आगे निकल गए
IMD ने 3,000–3,200 मीटर से ऊपर हल्की बर्फ की संभावना जताई, लेकिन वैज्ञानिक साफ कहते हैं—
हल्की, छिटपुट snowfall हिमालय को नहीं बचा सकती।
हिमालय को चाहिए निरंतर बर्फ, जो महीनों तक धीरे-धीरे पिघले।
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पारिस्थितिकी पर सीधा असर: ‘Snow drought’ की शुरुआत
हिमालयी पर्यावरण पर काम करने वाले वैज्ञानिक संस्थानों, खासकर GB Pant National Institute of Himalayan Environment, की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सर्दियों की बर्फबारी:
- अल्पाइन पौधों के लिए प्राकृतिक थर्मल कवर है
- औषधीय जड़ी-बूटियों को तापमान के झटकों से बचाती है
जब बर्फबारी नहीं होती:
- पौधों का जीवन-चक्र बिगड़ता है
- बीज और जड़ें खुली ठंड–गर्मी झेलती हैं
- जैव विविधता कमजोर पड़ती है
वैज्ञानिक इसे “snow drought” कहते हैं—और उत्तराखंड अब इसी स्थिति में प्रवेश करता दिख रहा है।
खेती: पहाड़ का किसान सबसे पहले मार झेल रहा है
उत्तराखंड की पर्वतीय खेती सीमांत है और snowfall उस खेती का प्राकृतिक सहारा रही है।
Indian Council of Agricultural Research (ICAR) के अनुसार सर्दियों में ठंड और बर्फ की कमी से:
- गेहूं और दालों की vernalization प्रक्रिया अधूरी रह जाती है
- कीट और रोग समय से पहले सक्रिय हो जाते हैं
स्थानीय कृषि आकलनों में कई इलाकों में 25% तक फसल नुकसान की बात सामने आ रही है।
यह नुकसान सिर्फ एक सीजन का नहीं, बल्कि पलायन और ग्रामीण अस्थिरता को तेज़ करने वाला है।
जंगलों में आग: सर्दियों में जो नहीं होना चाहिए था, वही हो रहा है
Forest Survey of India के डेटा के मुताबिक, जब सर्दियों में snowfall नहीं होती:
- मिट्टी में नमी नहीं बनती
- जंगल जल्दी सूख जाते हैं
इसी वजह से उत्तराखंड में जनवरी में ही जंगल की आग की घटनाएँ सामने आ रही हैं।
यह सामान्य नहीं है—यह नए खतरे की शुरुआत है।
ग्लेशियर और पानी: असली संकट अभी सामने आना बाकी है
उत्तराखंड की नदियाँ—भागीरथी, अलकनंदा—
अपना जीवन snowfall और ग्लेशियरों से पाती हैं।
National Centre for Polar and Ocean Research के अध्ययनों के अनुसार:
- कम snowfall = कम recharge
- ग्लेशियर तेज़ी से पिघलते हैं
- अल्पकाल में बाढ़, दीर्घकाल में जल संकट
जो आज बर्फ के रूप में नहीं दिख रहा, वह कल पानी की कमी बनकर मैदानों तक पहुँचेगा। यही बर्फबारी पहाड़ से मैदान तक जीवन की lifeline बनता है।
पर्यटन पर असर: औली की सूनी ढलानें
Auli उत्तराखंड के शीतकालीन पर्यटन की पहचान है।
जनवरी 2026 में:
- बर्फबारी न होने से स्कीइंग सीज़न प्रभावित
- होटल बुकिंग में गिरावट
- स्थानीय रोज़गार पर सीधा असर
यह साफ बताता है कि उत्तराखंड का पर्यटन मॉडल पूरी तरह बर्फ पर निर्भर है—और वह आधार अब डगमगा रहा है।
यह सिर्फ मौसम नहीं, नीति की परीक्षा है
आज सवाल साफ है—क्या इसे “एक खराब साल” कहकर छोड़ दिया जाए?
अगर ऐसा हुआ, तो:
- जल सुरक्षा पर दबाव
- खेती और आजीविका की अस्थिरता
- जंगल की आग और आपदाएँ
- और पर्यटन का मौजूदा मॉडल
सब खतरे में पड़ जाएगा।
उत्तराखंड में बर्फबारी की कमी अब आपदा-पूर्व चेतावनी है, जिसे नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है।
हिमालय चुप है, लेकिन संकेत साफ हैं
उत्तराखंड में snowfall का न होना भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि डेटा और शोध से निकली चेतावनी है।
हिमालय हमेशा शोर नहीं करता—वह संकेत देता है।
जनवरी 2026 का संकेत साफ है।
यह सिर्फ मौसम की खबर नहीं है।
यह उत्तराखंड के भविष्य की चेतावनी है।
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