संसद भवन, नई दिल्ली – संसद के मानसून सत्र के दौरान सोमवार को एक अहम राजनीतिक मोड़ देखने को मिला जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार से ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सीधा जवाब मांगा। खड़गे ने दावा किया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 24 बार यह कह चुके हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद जो संघर्षविराम हुआ, वह उनकी मध्यस्थता का परिणाम था।
खड़गे ने राज्यसभा में कहा,
“देश को यह जानने का अधिकार है कि ऑपरेशन सिंदूर में क्या हुआ था। अगर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ऐसा दावा कर रहे हैं, तो सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्या वाकई भारत ने ट्रंप के दबाव में यह निर्णय लिया? अगर नहीं, तो फिर चुप्पी क्यों?”
इस बयान के तुरंत बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कांग्रेस पर करारा पलटवार किया। नड्डा ने कहा:
“हम बहस से भागने वाले लोग नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जो ऑपरेशन सिंदूर हुआ, वैसा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुआ। ये अभूतपूर्व है। हम निश्चित रूप से इस पर चर्चा के लिए तैयार हैं।”
जेपी नड्डा का यह बयान संकेत करता है कि भाजपा अब ऑपरेशन सिंदूर को राष्ट्रीय गौरव की तरह प्रस्तुत करना चाहती है, जबकि विपक्ष इसे गोपनीयता, विदेशी हस्तक्षेप और पारदर्शिता की कमी का मामला बनाकर पेश कर रहा है।
क्या है ऑपरेशन सिंदूर?
हालांकि सरकार ने अब तक आधिकारिक रूप से ऑपरेशन सिंदूर की पूरी जानकारी साझा नहीं की है, परंतु सूत्रों के अनुसार यह एक गुप्त सैन्य अभियान था, जो सीमावर्ती इलाके में भारत के रणनीतिक वर्चस्व को स्थापित करने के लिए चलाया गया था। यह ऑपरेशन कुछ सप्ताह पूर्व अंजाम दिया गया, और इसके बाद क्षेत्र में अचानक संघर्षविराम की घोषणा हो गई थी।
ट्रंप की भूमिका पर सवाल
डोनाल्ड ट्रंप के कथित बयानों को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दे सका है। खड़गे इसी बिंदु को लेकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि अगर ऑपरेशन भारत की रणनीतिक योजना थी, तो फिर एक विदेशी नेता उसके बाद हुए संघर्षविराम का श्रेय कैसे ले सकता है?
सरकार की रणनीति
भाजपा नेतृत्व इसे प्रधानमंत्री मोदी की सैन्य दृष्टि और कूटनीतिक सूझबूझ का परिणाम बता रही है। नड्डा ने साफ कहा:
“हम हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं। लेकिन यह भी याद रखिए – यह नया भारत है। जो सीमा पार से आतंक फैलाता है, उसे मुंहतोड़ जवाब मिलेगा। ऑपरेशन सिंदूर उसी सोच का हिस्सा था।”
सत्र की आगामी कार्यवाही में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार ऑपरेशन सिंदूर पर विस्तृत बयान देती है या फिर विपक्ष इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनाता है। फिलहाल, यह स्पष्ट है कि ऑपरेशन सिंदूर न केवल एक सैन्य अभियान था, बल्कि अब यह एक प्रमुख राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुका है।
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