देहरादून।
उत्तराखंड में जल संरक्षण अब सिर्फ एक सरकारी पहल नहीं, बल्कि एक मिशन मोड आंदोलन बनता जा रहा है—और इसकी कमान संभाली है सचिव जलागम एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA) दिलीप जावलकर ने।
उनकी अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय कार्यकारी समिति (SLEC) की चौथी बैठक में जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन के क्षेत्र में ₹382.26 लाख की तीन प्रमुख योजनाओं को स्वीकृति दी गई।
जावलकर का फोकस: हर जिले की अपनी नदी, हर गांव का अपना स्रोत
बैठक में दिलीप जावलकर ने स्पष्ट संदेश दिया—“जल है तो कल है, और इसका संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी है।”
उन्होंने राज्य के सभी जिलों को “वन डिस्ट्रिक्ट, वन रिवर” मॉडल पर अपनी कार्ययोजनाएं तैयार करने के निर्देश दिए। इसका मकसद है कि हर जिला अपनी प्रमुख नदी या धारा को केंद्र में रखकर जलागम आधारित विकास मॉडल बनाए, जिससे वर्षा जल का अधिकतम संरक्षण और भू-जल स्तर का पुनर्जीवन संभव हो।
उन्होंने कहा कि अब समय है जब गांव-गांव में जल संरक्षण आंदोलन को पुनः जीवित किया जाए और धारा-नौला संरक्षण समितियों का गठन कर पारंपरिक जलस्रोतों की जिम्मेदारी स्थानीय समुदायों को दी जाए।
तीन बड़ी परियोजनाओं को हरी झंडी
जावलकर की पहल पर इस बैठक में जिन तीन योजनाओं को मंजूरी मिली, उनमें प्रमुख हैं—
- नैनीताल और उधमसिंह नगर जिलों के लिए ₹207.56 लाख की भू-गर्भीय जलभृत रीचार्ज योजना,
- और चमोली जनपद की चंद्रभागा नदी पुनर्जीवन परियोजना जिसकी लागत ₹174.70 लाख तय की गई है।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य है वर्षा जल संग्रहण, भूजल संवर्धन और स्थानीय जल स्रोतों का सतत पुनर्जीवन।
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जल संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी ही कुंजी
दिलीप जावलकर ने सभी जिलों के अधिकारियों को निर्देश दिए कि जल संरक्षण सिर्फ तकनीकी कार्य नहीं, बल्कि सामुदायिक चेतना का हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने कहा, “पानी बचाना सिर्फ इंजीनियरिंग नहीं, लोकसंस्कृति का पुनरुद्धार है।”
उन्होंने ग्राम पंचायत स्तर पर धारा-नौला समितियों के गठन और स्थानीय पैराहाइड्रोलॉजिस्टों के प्रशिक्षण पर जोर दिया ताकि जल प्रबंधन में स्थानीय विशेषज्ञता विकसित हो।
टेक्नोलॉजी और परंपरा का संगम
जावलकर का दृष्टिकोण स्पष्ट है — तकनीक और परंपरा का संतुलन ही स्थायी समाधान दे सकता है।
उन्होंने SARRA से जुड़े सभी रेखीय विभागों की टेक्निकल टीमों को विशेष प्रशिक्षण देने के निर्देश दिए, ताकि योजनाओं का क्रियान्वयन वैज्ञानिक ढंग से हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश की धारों और नौलों का तत्काल चिन्हीकरण किया जाए और उनके पुनर्जीवन को “मिशन मोड” में आगे बढ़ाया जाए।
एकीकृत प्रयासों से बनेगा उत्तराखंड का जल मॉडल
बैठक में अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहकशां नसीम ने एक करोड़ से अधिक लागत वाली योजनाओं का विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया।
उन्होंने बताया कि सभी विभाग — सिंचाई, लघु सिंचाई, कृषि, वन, ग्राम्य विकास — को एक ही जलागम क्षेत्र पर संयुक्त रूप से कार्य करना होगा, ताकि उस क्षेत्र का सतत पुनर्जीवन संभव हो सके।
जावलकर ने कहा, “जब सरकार, समाज और तकनीकी विशेषज्ञ एक साथ सोचेंगे — तभी जल का भविष्य सुरक्षित रहेगा।”
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जावलकर का विज़न: जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाना
इस बैठक में विभिन्न जिलों के मुख्य विकास अधिकारी, प्रभागीय वनाधिकारी, सिंचाई, लघु सिंचाई, कृषि व ग्राम विकास विभागों के अधिकारी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े।
SARRA की राज्य स्तरीय टीम भी उपस्थित रही।
बैठक का सार यही रहा — दिलीप जावलकर की नेतृत्व दृष्टि में जल संरक्षण एक नीतिगत निर्णय से आगे बढ़कर सामाजिक चेतना का हिस्सा बन चुका है।
उनके “वन डिस्ट्रिक्ट, वन रिवर” विज़न के तहत अब उत्तराखंड के गांवों से लेकर शहरों तक पानी बचाने की नई सोच आकार ले रही है।
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