उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के औद्योगिक क्षेत्र सेलाकुई में एक खतरनाक और जानलेवा रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। STF (Special Task Force) ने एक ऐसी फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है, जहां वर्षों से ब्रांडेड कंपनियों की हूबहू नकली दवाएं बनाकर उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में सप्लाई की जा रही थीं। इस मामले में फैक्ट्री मालिक समेत गिरोह के कुल 4 सदस्यों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी: फैक्ट्री मालिक STF की गिरफ्त में
STF ने छापेमारी के दौरान फैक्ट्री के मालिक को रंगे हाथों पकड़ा। जांच में खुलासा हुआ कि यह गिरोह वर्षों से जीवन रक्षक दवाओं की नकल कर उन्हें बाजार में ऊंचे दामों पर सप्लाई कर रहा था। इन नकली दवाओं में वो सभी चीजें मौजूद थीं जो एक आम मरीज को भ्रमित कर सकें — ब्रांडेड पैकेजिंग, हूबहू लोगो, मिलते-जुलते बैच नंबर और एक्सपायरी डेट।
2021 से 2025 तक करोड़ों की सप्लाई
जांच में यह भी सामने आया है कि 2021 से लेकर अब तक गिरोह द्वारा ₹1 करोड़ 42 लाख 30 हजार की टैबलेट्स और 2 लाख कैप्सूल की सप्लाई की जा चुकी है। यह माल डॉ. नवीन बंसल को दिया जाता था, जो इन्हें आगे बाजार में उतारते थे। बंसल नकली दवाओं की भारी खेप देवी दयाल नामक सप्लायर से लेते थे।
फर्जीवाड़े की जड़ें गहरी: गिरोह के कई सदस्य पहले से जेल में
इस गोरखधंधे में शामिल संतोष कुमार, नवीन बंसल और आदित्य काला को पहले ही जेल भेजा जा चुका है। STF की टीमें अब गिरोह के अन्य सदस्यों की कुंडली खंगालने में जुटी हैं। कई संदिग्धों के मोबाइल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन और कॉल डिटेल्स की जांच की जा रही है।
सेलाकुई की फैक्ट्री में नकली दवाओं की फैक्ट्री
गिरफ्तार मालिक की फैक्ट्री सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है, जहां भारी मात्रा में नकली दवाएं बनाई जाती थीं। पैकिंग से लेकर लेबलिंग तक का पूरा सिस्टम तैयार था, जिससे कोई भी आसानी से असली-नकली में फर्क नहीं कर पाता।
STF की कार्रवाई ने खोली दवा बाजार की काली हकीकत
STF की इस कार्रवाई ने न सिर्फ नकली दवाओं के काले कारोबार का पर्दाफाश किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि कैसे कुछ लालची कारोबारी इंसानी ज़िंदगियों से खिलवाड़ कर रहे हैं। इस घोटाले ने पूरे दवा बाजार की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
STF अब पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है। जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क के तार और किन बड़े फार्मा डीलरों और मेडिकल स्टोर्स से जुड़े हैं। गिरोह से बरामद दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य आने वाले दिनों में और बड़े नामों का खुलासा कर सकते हैं।
यह कहानी सिर्फ एक छापे की नहीं, बल्कि उस अंधेरे की है जो हमारी दवा की दुकानों के पीछे छिपा बैठा है।
“ज़रा सी लापरवाही, ज़िंदगी पर भारी” — नकली दवाओं के इस रैकेट ने एक बार फिर इस चेतावनी को सच कर दिखाया है।
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