बच्चों और युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत को लेकर महाराष्ट्र सरकार सख्त कदम उठाने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार जल्द ही 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों के लिए ऑनलाइन गेम्स पर समयसीमा या पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून लाने पर विचार कर रही है। इस संभावित कदम को देश में डिजिटल स्वास्थ्य और स्क्रीन-संवेदनशीलता की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक “सर्जिकल स्ट्राइक” की तरह है—उन डिजिटल आदतों पर, जो बच्चों की पढ़ाई, सामाजिकता और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं।
डिजिटल लत: नई पीढ़ी के लिए छिपी आपातकालीन स्थिति
अनेक शोधों में यह सामने आया है कि भारत में 10 में से 6 किशोर प्रतिदिन 3 से 5 घंटे मोबाइल या टैबलेट पर बिताते हैं। शॉर्ट वीडियो, इंस्टा-रील्स और विशेष रूप से ऑनलाइन गेम्स की लत के कारण बच्चों में नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, आक्रामक व्यवहार और एकाकीपन जैसी समस्याएं तेजी से उभर रही हैं।
कुछ मामलों में गेमिंग की यह लत आत्महत्या और अपराध जैसे गंभीर सामाजिक परिणामों का कारण भी बन चुकी है।
क्या उत्तराखंड अपनाएगा ‘डिजिटल डिटॉक्स’ नीति?
अब सबकी नजर उत्तराखंड सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर है। धामी इससे पहले भी यूनिफॉर्म सिविल कोड पर तेजी से पहल, भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस, भूमाफिया पर कार्रवाई और डिजिटल निगरानी जैसे कई निर्णायक फैसले ले चुके हैं।
राज्य के शिक्षा और युवा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य, जहां डिजिटल उपकरणों का बढ़ता उपयोग एक नई सामाजिक चुनौती बन रहा है, वहां इस दिशा में विशेष नीति की आवश्यकता है।
सूत्रों की मानें तो राज्य सरकार जल्द ही डिजिटल लत से निपटने के लिए एक ‘उत्तराखंडी मॉडल’ पर विचार कर सकती है, जिसमें निम्नलिखित पहलू शामिल हो सकते हैं:
- स्कूलों में डिजिटल स्वास्थ्य शिक्षा को अनिवार्य बनाना
- 18 वर्ष से कम उम्र के लिए स्क्रीन टाइम सीमा तय करना
- AI आधारित अभिभावकीय नियंत्रण प्रणाली
- अभिभावकों के लिए जागरूकता अभियान
- खेल, योग और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना
राजनीतिक इच्छाशक्ति की अग्निपरीक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक सामाजिक या तकनीकी विषय नहीं है, बल्कि नेतृत्व और दूरदृष्टि की भी परीक्षा है। महाराष्ट्र ने जहां शुरुआत कर दी है, वहीं उत्तराखंड जैसे राज्यों के पास अब अवसर है कि वे डिजिटल स्वास्थ्य को लेकर राष्ट्रीय मॉडल प्रस्तुत करें।
भारत यदि डिजिटल महाशक्ति बनना चाहता है, तो उसे अपनी अगली पीढ़ी को डिजिटल लत की बेड़ियों से मुक्त करना होगा। बदलाव केवल पाठ्यक्रम में नहीं, बल्कि सोच और नीति में दिखना चाहिए।
अब देखना यह होगा कि कौन-सा राज्य आगे बढ़कर समाधान का नेतृत्व करता है, और कौन केवल समस्या को देखकर चुप रहता है।
अमितेन्द्र शर्मा
