केंद्र सरकार के संभावित कैबिनेट विस्तार से पहले राजनीतिक हलकों में जबरदस्त हलचल मची हुई है। इस बार चर्चा का केंद्र कोई नए चेहरों का आना नहीं, बल्कि एक अनुभवी और प्रभावशाली मंत्री की संभावित विदाई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को मंत्रिपरिषद से हटाया जा सकता है, या उन्हें किसी अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
यह खबर जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भी। डॉ. जयशंकर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वासपात्र और विदेश नीति का आर्किटेक्ट माना जाता है। ऐसे में यदि यह परिवर्तन होता है, तो इसके दूरगामी संकेत होंगे — न केवल सरकार की आंतरिक रणनीति को लेकर, बल्कि भारत की वैश्विक नीति-प्रस्तुति को लेकर भी।
अनुभवी राजनयिक से मंत्री तक: जयशंकर की यात्रा
पूर्व विदेश सचिव रह चुके डॉ. एस. जयशंकर ने 2019 में सीधे कैबिनेट में प्रवेश किया था। एक करियर डिप्लोमैट से मंत्री बनने वाले वे भारत के पहले व्यक्ति हैं। बीते पाँच वर्षों में उन्होंने भारत की विदेश नीति को नई दिशा दी — जिसमें क्वाड, ब्रिक्स, संयुक्त राष्ट्र, यूक्रेन युद्ध, चीन सीमा विवाद, और अमेरिका से सामरिक संबंध प्रमुख रहे।
उन्होंने स्पष्ट, सशक्त और आत्मविश्वासपूर्ण विदेश नीति की एक नई शैली प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने भारत की संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी। उनके वक्तव्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बार-बार सुर्खियाँ बने और भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूती मिली।
संभावित कारण: क्यों उठ रही हैं विदाई की अटकलें?
- राजनीतिक संतुलन और पुनर्संयोजन
मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में सहयोगी दलों को प्रतिनिधित्व देने और आगामी वर्षों की रणनीति को देखते हुए मंत्रिपरिषद में संतुलन बना रही है। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं को नई जिम्मेदारियाँ देने की योजना बन सकती है। - पार्टी और सरकार के बीच संतुलन
भाजपा नेतृत्व के भीतर यह धारणा है कि कुछ वरिष्ठ चेहरों को अब संगठनात्मक भूमिका दी जाए, जिससे वे नीतिगत फैसलों में पार्टी की दिशा तय कर सकें। - नई प्राथमिकताओं के अनुरूप फेरबदल
प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली में समय-समय पर मंत्रियों का पुनर्मूल्यांकन होता रहा है। विदेश मंत्रालय जैसे संवेदनशील विभाग में अब शायद कोई नया चेहरा लाकर उसे अगले दशक की कूटनीतिक चुनौतियों के लिए तैयार किया जाए।
अगर जयशंकर हटते हैं तो क्या प्रभाव पड़ेगा?
- विदेश नीति में निरंतरता का सवाल
जयशंकर के कार्यकाल में विदेश मंत्रालय ने जिस स्पष्टता और मजबूती के साथ कार्य किया, उसकी निरंतरता बनाए रखना किसी भी नए मंत्री के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। - वैश्विक मंच पर संदेश
भारत की विदेश नीति अब व्यक्तिवादी चेहरे के साथ पहचानी जाती है। जयशंकर की शैली ने भारत को मुखर और दृढ़ राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया। उनके हटने से एक संदेश यह भी जा सकता है कि भारत अपने कूटनीतिक नेतृत्व में बदलाव की ओर है। - संगठनात्मक मजबूती या वैकल्पिक जिम्मेदारी?
यदि उन्हें किसी अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जाती है, जैसे रक्षा, वाणिज्य या आंतरिक सुरक्षा, तो यह सरकार द्वारा उनकी क्षमताओं का पुनः प्रयोग होगा। वहीं, यदि वे पार्टी संगठन में जाते हैं, तो यह 2029 की रणनीति का हिस्सा माना जाएगा।
संभावित उत्तराधिकारी कौन?
अगर विदेश मंत्रालय में बदलाव होता है तो हरदीप सिंह पुरी, पीयूष गोयल, या एस जयशंकर जैसे विदेश मामलों के अनुभवी अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। हालांकि यह निर्णय पूरी तरह से प्रधानमंत्री के विवेक पर निर्भर है और इस पर अंतिम मुहर उन्हीं की लगेगी।
डॉ. एस. जयशंकर की संभावित विदाई केवल एक मंत्री के पोर्टफोलियो में बदलाव नहीं, बल्कि मोदी सरकार की बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक योजना का हिस्सा हो सकता है। यह फैसला यदि होता है, तो निश्चित ही इसकी गूंज दिल्ली से लेकर वाशिंगटन और बीजिंग तक सुनाई देगी।
अभी तक आधिकारिक रूप से कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से इस विषय पर चर्चाएँ तेज़ हो रही हैं, उससे संकेत मिल रहे हैं कि कैबिनेट विस्तार केवल संख्या या संतुलन का मामला नहीं—बल्कि सरकार की अगली दिशा तय करने वाला एक अहम मोड़ होगा।
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