साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को वह चेहरा दिखाना भी है जिसे वह अक्सर छिपाने का प्रयास करता है। हिंदी साहित्य के इतिहास में ऐसे विरले ही अवसर आते हैं जब कोई कृति न केवल पाठकों को बांधती है, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी हलचल मचाने का माद्दा रखती है। वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र मोहन शर्मा, जिनके खाते में 300 से अधिक पुस्तकें और 200 से अधिक सम्मान दर्ज हैं, अपने नवीनतम उपन्यास ‘नीले सपने’ (Nele Sapne) के साथ पुनः चर्चा के केंद्र में हैं। मेरे पत्रकारिता अनुभव में, मैंने कई रचनाएँ पढ़ी हैं, लेकिन शर्मा जी की यह कृति वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने पर एक ऐसा प्रहार है, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई देगी। यह उपन्यास एक ‘भिखारी’ के ‘अरबपति’ बनने की यात्रा नहीं, बल्कि हमारे खोखले होते नैतिक मूल्यों का दस्तावेज है।

यथार्थ के धरातल पर एक ‘सामाजिक प्रयोग’
‘नीले सपने’ के केंद्र में जो कथा है, वह सतह पर तो एक व्यक्ति ‘राजू’ की है, लेकिन गहराई में उतरने पर यह एक पूरे दौर की कहानी लगती है। लेखक ने राजू के चरित्र को किसी फिल्मी नायक की तरह नहीं, बल्कि समाज द्वारा निर्मित एक ‘फ्रेंकेंस्टीन’ के रूप में गढ़ा है।
राजू का एक साधारण भिखारी से ‘बिजनेस टाइकून’ और सत्ता के केंद्र तक पहुँचना, लेखक की उस सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है जो यह देख पाती है कि फुटपाथ की धूल और संसद के वातानुकूलित कक्षों के बीच का फासला कितना कम, और साथ ही कितना गहरा है। राजेंद्र मोहन शर्मा ने बड़ी बेबाकी से ‘बादशाह बस्ती’ का चित्रण किया है, जहाँ भीख मांगना मजबूरी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रशिक्षण और व्यवसाय है। यह चित्रण इतना जीवंत है कि पाठक को यह सोचने पर विवश कर देता है कि हम जिस समाज में जी रहे हैं, वहां संवेदनाओं का बाजारीकरण किस हद तक हो चुका है।
लेखक ने यहाँ कल्पना की उड़ान भरने के बजाय, मनोविज्ञान का सहारा लिया है। राजू जब सिस्टम को ‘हैक’ करता है—झूठी खबरों (Fake News), आईटी सेल और धर्म के दुरुपयोग के माध्यम से—तो वह महज एक पात्र नहीं रहता, बल्कि आज के दौर का एक प्रतीक बन जाता है। यह उपन्यास हमें यह सोचने पर बाध्य करता है कि क्या सफलता के शिखर पर बैठा व्यक्ति वास्तव में योग्य है, या वह केवल उन कमियों का लाभ उठा रहा है जो हमारे सिस्टम ने छोड़ी हैं।
आपदा में अवसर: एक डरावना भविष्य
उपन्यास का सबसे सशक्त और संभवतः सबसे विचलित करने वाला पक्ष है—’ब्लैक फीवर’ महामारी का चित्रण। राजेंद्र मोहन शर्मा की दूरदर्शिता यहाँ चकित करती है। उन्होंने ‘डिजास्टर कैपिटलिज्म’ (आपदा पूंजीवाद) की अवधारणा को जिस तरह से कहानी में पिरोया है, वह रोंगटे खड़े करने वाला है।
जब पूरा समाज एक महामारी से त्रस्त हो, तब कुछ लोग उसे ‘व्यापारिक अवसर’ में कैसे बदल देते हैं, इसका चित्रण लेखक ने पूरी निर्ममता और ईमानदारी से किया है। यह केवल कोरी कल्पना नहीं है। हम सभी ने विगत वर्षों में देखा है कि कैसे संकट के समय में मुनाफाखोरी और अवसरवाद ने मानवता को शर्मसार किया। ‘नीले सपने’ इस स्याह सच को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखता है। लेखक ने यह जोखिम उठाया है कि वे उन सत्यों को लिखें जिन पर अक्सर मुख्यधारा का मीडिया मौन धारण कर लेता है। यह साहस ही राजेंद्र मोहन शर्मा को उनके समकालीनों से अलग और विशिष्ट बनाता है।
अनुभव और लेखन का अद्भुत संगम

300 से अधिक पुस्तकों का लेखन कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। यह संख्या केवल कागज के पन्नों की नहीं, बल्कि उस अनुभव की है जो लेखक ने दशकों में अर्जित किया है। ‘नीले सपने’ में यह अनुभव हर पृष्ठ पर बोलता है।
* संवादों की मार: उपन्यास के संवाद चुटीले हैं और सीधे पाठक के मर्म पर प्रहार करते हैं। वे केवल पात्रों की बातचीत नहीं, बल्कि लेखक के जीवन दर्शन का निचोड़ हैं।
* कथा का प्रवाह: उपन्यास की गति (Pacing) इतनी सधी हुई है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे बीच में छोड़ना कठिन है। थ्रिलर का रोमांच और गंभीर साहित्य का चिंतन, दोनों का ऐसा संतुलन कम ही देखने को मिलता है।
अंत में, मैं यही कहूंगा कि ‘नीले सपने’ केवल एक थ्रिलर उपन्यास नहीं है। यह एक अनुभवी पत्रकार और साहित्यकार द्वारा समाज को दी गई एक चेतावनी है। राजेंद्र मोहन शर्मा ने यह सिद्ध कर दिया है कि उम्र और अनुभव के साथ उनकी कलम की धार और भी पैनी हुई है।
महात्मा विदुर’ की गूंज: राजेंद्र मोहन शर्मा को मिला साहित्यिक उत्कृष्टता का सम्मान
आज की युवा पीढ़ी, जो अक्सर हिंदी साहित्य से विमुख हो रही है, उसे यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए। यह उन्हें बताएगा कि हिंदी में भी वैश्विक स्तर का, विचारोत्तेजक और समकालीन साहित्य रचा जा रहा है। यदि आप भारत की नब्ज को, इसकी राजनीति को, और इसके सामाजिक विरोधाभासों को समझना चाहते हैं, तो ‘नीले सपने’ आपके पुस्तकालय में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। यह एक ऐसी कृति है जो आपको बेचैन करेगी, और यही अच्छे साहित्य की पहचान है।
