नई दिल्ली – संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार फिर 100 सीटों का जादुई आंकड़ा पार कर इतिहास दोहरा दिया है। अप्रैल 2022 के बाद यह पहला मौका है जब भाजपा की सदस्य संख्या 100 के पार पहुंची है — और इसकी वजह बने हैं हाल ही में राष्ट्रपति द्वारा नामित किए गए तीन प्रतिष्ठित चेहरे, जिन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया।
कौन हैं ये तीन चेहरे जिनसे बदल गया गणित?
- उज्ज्वल निकम – देश के सबसे चर्चित और भरोसेमंद सरकारी वकीलों में शुमार। 1993 मुंबई ब्लास्ट केस और अजमल कसाब केस में उनकी भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। अब वे भाजपा के साथ उच्च सदन में न्याय का प्रतिनिधित्व करेंगे।
- हर्षवर्धन श्रृंगला – भारत के पूर्व विदेश सचिव और कई अहम कूटनीतिक मोर्चों के अनुभवी सिपाही। अमेरिका, बांग्लादेश और थाईलैंड में भारत के राजदूत रह चुके श्रृंगला की विदेश नीति में गहरी समझ है, जो अब संसद में सरकार की ताकत बनकर उभरेगी।
- सी. सदानंदन मास्टर – केरल के जाने-माने शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता, जो दशकों से संघ विचारधारा से जुड़े हैं। केरल में भाजपा के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले इस चेहरे की उपस्थिति से दक्षिण भारत में भी भाजपा का मनोबल बढ़ा है।
भाजपा का आंकड़ा 102 – और NDA की कुल ताकत 134
भाजपा के अब राज्यसभा में कुल 102 सांसद हो गए हैं। एनडीए के सहयोगी दलों को मिलाकर यह आंकड़ा 134 तक पहुंच चुका है, जो राज्यसभा के बहुमत के आंकड़े 121 से कहीं आगे है। ऐसे में अब सरकार के लिए कोई भी बड़ा या विवादित विधेयक पास कराना पहले की तुलना में कहीं आसान हो जाएगा।
उप-राष्ट्रपति चुनाव से पहले सटीक टाइमिंग!
भाजपा का यह शतक सिर्फ एक संख्या नहीं है — यह एक रणनीतिक समय पर हासिल की गई जीत है। उप-राष्ट्रपति चुनाव के ठीक पहले यह ताकत विपक्ष के लिए बड़ा झटका है। उप-राष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति भी होते हैं और उनकी भूमिका उच्च सदन के संचालन में निर्णायक होती है। ऐसे में भाजपा और एनडीए का यह संख्याबल आने वाले दिनों की सियासी दिशा तय करेगा।
भाजपा ने फिर दोहराया इतिहास
भाजपा ने पहली बार अप्रैल 2022 में राज्यसभा में 100 सीटों का आंकड़ा छुआ था। लेकिन समय के साथ कुछ सदस्यों के रिटायर होने से यह संख्या घट गई थी। अब 2025 में दोबारा यह मुकाम हासिल करके भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि उसकी संगठनात्मक और रणनीतिक क्षमता संसद के दोनों सदनों में प्रभावी बनी हुई है।
गौरतलब है कि इससे पहले केवल कांग्रेस ही 1988 और 1990 के बीच राज्यसभा में 100 से अधिक सांसदों वाली पार्टी रही थी। अब भाजपा ने यह कारनामा दो बार कर दिखाया है।
क्या अब पूरी तरह भाजपा का ‘ऊपरी सदन’?
राज्यसभा को अक्सर “विचारों का सदन” कहा जाता है, लेकिन जब बहुमत की राजनीति आती है, तो आंकड़े ही सबसे बड़ा विचार बन जाते हैं। भाजपा के पास लोकसभा में पहले से बहुमत है और अब राज्यसभा में भी निर्णायक बढ़त मिलना विपक्ष के लिए एक और झटका है। इसका मतलब है कि सरकार के बड़े सुधार, संवैधानिक संशोधन और नीतिगत फैसले अब और सहजता से पारित हो सकेंगे।
राज्यसभा में भाजपा का यह शतक सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सफर की भी झलक है, जिसमें पार्टी ने ज़मीनी स्तर से सत्ता के हर स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की है।