चेन्नई/नई दिल्ली। तमिलनाडु के करूर में अभिनेता से नेता बने विजय की राजनीतिक रैली उस वक्त मौत का मंजर बन गई, जब भीड़ बेकाबू होकर भगदड़ में बदल गई। ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस दर्दनाक हादसे में मरने वालों की संख्या बढ़कर 38 हो गई है। मृतकों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। पूरा प्रदेश शोक और आक्रोश से गूंज उठा है।
केंद्र ने मांगी रिपोर्ट, हाई-लेवल जांच का आदेश
हादसे की भयावहता को देखते हुए केंद्र सरकार तुरंत हरकत में आई और गृह मंत्रालय ने तमिलनाडु सरकार से इस घटना पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। वहीं मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने मृतकों के परिवारों को ₹10 लाख और घायलों को ₹1 लाख की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। राज्य सरकार ने एक सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया है, जिसकी अध्यक्षता मद्रास उच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अरुणा जगदीसन करेंगी।

DMK का आक्रामक वार: “विजय कहाँ छिपे हैं?”
सत्तारूढ़ डीएमके ने हादसे का ठीकरा सीधा विजय और उनकी नई पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) पर फोड़ा है। पार्टी के प्रवक्ताओं ने सवाल उठाते हुए कहा,
“मिस्टर विजय अब कहाँ हैं? क्यों गायब हो गए? रैली में अनुमति से कई गुना अधिक भीड़ क्यों बुलाई गई? आयोजकों ने सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी क्यों की?”
रिपोर्टों के मुताबिक प्रशासन ने रैली में 10,000 लोगों की अनुमति दी थी, लेकिन करीब 50,000 लोग उमड़ पड़े। सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की भारी चूक इस त्रासदी की जड़ बताई जा रही है।
विजय की चुप्पी टूटी, कहा—”दिल टूट गया है”
हादसे के बाद भारी दबाव में आए विजय ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर एक भावुक पोस्ट किया। उन्होंने लिखा कि उनका दिल टूट गया है और वह “असहनीय, अवर्णनीय पीड़ा और दुख” में हैं। विजय ने पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बयान आलोचनाओं को थाम नहीं सका।
राष्ट्रीय नेताओं का शोक
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पोस्ट किया, “करूर, तमिलनाडु में हुई दुखद मौतों से गहरा दुख हुआ। मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदनाएं। घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूँ।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समेत कई राष्ट्रीय नेताओं ने भी इस भीषण हादसे पर गहरी संवेदना व्यक्त की है।
राजनीतिक रैलियों पर उठे बड़े सवाल
करूर की यह त्रासदी सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि देश की राजनीतिक रैलियों और जनसभाओं में सुरक्षा इंतजामों की पोल खोल गई है। जब चुनावी भीड़ राजनीति का हथियार बन जाए और सुरक्षा व्यवस्थाएं दिखावटी साबित हों, तो नतीजे ऐसे ही भयावह निकलते हैं। सवाल अब सीधा है—क्या राजनीति भीड़ की भूख से बड़ी है या इंसानी जानों की कीमत?
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