गुरुग्राम — भारत की आधुनिकता और तेज़ रफ्तार जीवनशैली का प्रतीक। लेकिन इन दिनों इस चमकते-दमकते शहर में कुछ ऐसा घट रहा है जिसने लाखों घरों की रोजमर्रा की ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। सैकड़ों की संख्या में घरेलू कामगार — मेड, रसोइए, सफाईकर्मी — अचानक गायब हो गए हैं। न केवल वे अपने काम पर नहीं आ रहे, बल्कि उनके मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ हैं।
जहां पहले हर सुबह सोसाइटियों में मेड्स की दस्तक, कूड़ा उठाने वालों की सीटी, और किचन में चाय के बर्तनों की खनक सुनाई देती थी — अब वहां सन्नाटा है। लोग खुद झाड़ू-पोंछा कर रहे हैं, टिफिन की जगह अब इंस्टेंट नूडल्स खा रहे हैं, और रसोई में गैस जलाना फिर से सीख रहे हैं।
रेड के बाद पसरा सन्नाटा
सूत्रों के मुताबिक, गुरुग्राम पुलिस और इमीग्रेशन विभाग ने हाल ही में एक बड़े स्तर पर कार्रवाई की है। शहर के कई इलाकों में — खासकर राजेंद्र पार्क, वजीराबाद, चक्करपुर, पटौदी रोड, पालम विहार और साउथ सिटी के आसपास — उन स्थानों पर छापेमारी हुई जहां भारी संख्या में घरेलू कामगार किराए पर रहते हैं।
इन छापों का मकसद था उन लोगों की पहचान करना जो बिना वैध दस्तावेजों के भारत में रह रहे हैं, खासकर बांग्लादेश और म्यांमार से आए प्रवासी कामगार। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 200 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें से कई ने खुद को पश्चिम बंगाल निवासी बताया, लेकिन उनके पास कोई ठोस दस्तावेज़ नहीं मिले।
पुलिस की अब तक की जांच में 11 बांग्लादेशी नागरिकों की पुष्टि हो चुकी है, जिनके खिलाफ निर्वासन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
शहर के हर कोने में दिखा असर
यह छापेमारी केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं रही — इसका तुरंत असर गुरुग्राम के हज़ारों घरों में दिखने लगा।
- सिकंदरपुर की एक सोसाइटी में रहने वाली आईटी प्रोफेशनल रिया मेहरा बताती हैं, “हमारी मेड पिछले 4 साल से काम कर रही थी। एक रात गायब हुई, और मोबाइल भी स्विच ऑफ है। हमने पड़ोस में पूछा — सबकी यही हालत है।”
- डीएलएफ फेज़ 3 में रहने वाले एक वरिष्ठ नागरिक कहते हैं, “हमारे कुक और क्लीनर दोनों एक साथ गायब हैं। अब खुद ही दाल-चावल बना रहे हैं। यह सिर्फ असुविधा नहीं, एक डर भी है।”
RWA ऑफिसों पर बढ़ी भीड़
गुरुग्राम की कई बड़ी रिहायशी सोसाइटियों के RWA ऑफिसों में मेड्स और सफाईकर्मियों की गैरमौजूदगी को लेकर लगातार शिकायतें दर्ज हो रही हैं। कुछ सोसाइटियों ने नए वेरिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जबकि कुछ ने कामगारों को लौटने से पहले पुलिस क्लीयरेंस अनिवार्य कर दिया है।
कानून और मानवता के बीच की खाई
एक तरफ पुलिस और प्रशासन का कहना है कि ये कार्रवाई राष्ट्रीय सुरक्षा और वैधता को सुनिश्चित करने के लिए है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या सभी घरेलू कामगार अवैध हैं? क्या सबको एक ही तराजू से तौलना ठीक है?
मजदूरी पर आधारित एक बड़ा वर्ग आज नौकरी, सम्मान और सुरक्षा — तीनों से वंचित हो गया है।
गुरुग्राम को अब जवाब ढूंढ़ना होगा
गुरुग्राम की गगनचुंबी इमारतों, स्टार्टअप्स और फास्ट-ट्रैक जीवनशैली के पीछे जो अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण कड़ी थी — वे घरेलू कामगार, अब ग़ायब हैं।
यह संकट न सिर्फ श्रमिकों की पहचान, दस्तावेज़ों या वीज़ा का है, बल्कि शहरी व्यवस्था की उस नाजुक नींव का भी है, जिस पर आज के मेट्रो शहर खड़े हैं।
शहर अब सकते में है — लेकिन सवाल यह है:
क्या यह शांति स्थायी है, या तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी?
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