MODI MASTERSTROKE: संसद में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर 16 घंटे की महाचर्चा, 29 जुलाई को मोदी और राजनाथ रहेंगे मौजूद

केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर संसद में 29 जुलाई को 16 घंटे लंबी विशेष बहस आयोजित करने की घोषणा की है। इस ऐतिहासिक चर्चा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह स्वयं भाग लेंगे।

सूत्रों के अनुसार, यह बहस सुबह 10 बजे से शुरू होकर देर रात तक चलेगी। संसद के दोनों सदनों को इस बहस के लिए आरक्षित रखा गया है, और राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक कार्रवाई, सैनिकों की भूमिका, खुफिया तंत्र और विदेश नीति से जुड़े अहम पहलुओं पर सरकार अपना पक्ष स्पष्ट करेगी।

🔴 क्या है ऑपरेशन सिंदूर?

हाल ही में चर्चित हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को भारत की अब तक की सबसे गुप्त और साहसी सैन्य कार्रवाई बताया जा रहा है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इसके विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह ऑपरेशन सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक जवाब था, जिसमें भारत ने बेहद सटीक और गुप्त तरीके से अपने लक्ष्य को साधा।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह अभियान भारत के पड़ोसी देशों में चल रहे आतंकी ठिकानों को खत्म करने से जुड़ा हो सकता है, जिसमें सर्जिकल या ड्रोन-आधारित हमले शामिल थे।

🛡️ क्यों है ये बहस अहम?

  • विपक्ष लंबे समय से इस ऑपरेशन को लेकर पारदर्शिता की मांग कर रहा था।
  • सेना की भूमिका, रणनीति और ऑपरेशन की सफलता पर देश को ब्रीफ करने का दबाव बढ़ रहा था।
  • अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि को लेकर भी यह बहस महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

🏛️ संसद का माहौल गर्माने की संभावना

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और टीएमसी जैसे विपक्षी दल इस चर्चा के दौरान सवाल उठाने की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पहले ही कहा है कि “देश को सच्चाई जानने का हक है।” वहीं, बीजेपी का दावा है कि “ऑपरेशन सिंदूर” भारत की सैन्य ताकत और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतीक है।

🎙️ प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री की उपस्थिति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बहस में मौजूद रहना दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को किस स्तर पर ले जा रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह विस्तार से ऑपरेशन की रूपरेखा, तैयारी और निष्कर्ष पर संसद को जानकारी देंगे।

यह बहस सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं होगी, बल्कि यह भारत की नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, आक्रामक कूटनीति, और सामरिक क्षमता के विस्तार का परिचायक बन सकती है।

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