सड़कें 1 महीने नहीं टिकतीं, योजनाएं 40% पर ही फंस जाती हैं
उत्तराखंड में विकास की चमक के पीछे जो स्याह हकीकत छिपी है, वह अब खुद सत्ता के गलियारों से सामने आ रही है। न्यूज़ वायरस के संपादक मोहम्मद सलीम सैफी के पॉडकास्ट में प्रदेश के निर्दलीय विधायक उमेश कुमार ने ऐसा बयान दिया है, जिसने पूरे सिस्टम की जड़ों में बैठे भ्रष्टाचार को बेनकाब कर दिया है।
💰 “काम शुरू होने से पहले ही 35-40% रखवा लिया जाता है”
उमेश कुमार ने कहा:
“कौन कहता है नेता कमीशन नहीं खाते? यहां तो पहले दिन ही 30 से 40 प्रतिशत तय हो जाता है, तभी कोई विकास कार्य आगे बढ़ता है।”
“और हालत ये है कि सड़कें एक महीना भी नहीं टिकतीं।”
यह बयान न सिर्फ ठेकेदारों और जनप्रतिनिधियों के गठजोड़ को उजागर करता है, बल्कि उन योजनाओं की सच्चाई भी सामने लाता है, जिन्हें जनता के लिए “उन्नति” के नाम पर लॉन्च किया जाता है।
👮♂️ “विधायक की बात पुलिस भी नहीं सुनती”
उमेश कुमार के मुताबिक, जिन विधायकों की छवि सही नहीं होती, उनकी सुनवाई उनके खुद के क्षेत्र में भी नहीं होती — यहां तक कि दरोगा और सिपाही भी नहीं मानते।
इससे साफ है कि सिस्टम केवल कागज़ों में चलता है, जमीनी हकीकत कुछ और है।
🏢 नौकरशाही बन गई है भ्रष्टाचार की रीढ़
जब पूछा गया कि क्या ब्यूरोक्रेसी भी भ्रष्ट है, तो उमेश कुमार ने साफ कहा:
“ब्यूरोक्रेसी से ही सारे भ्रष्ट हैं। कई मंत्री ऐसे हैं जिन्हें ABCD का ज्ञान नहीं है, अधिकारी ही बताते हैं कहां से फाइल आएगी, कहां से कमीशन मिलेगा।”
यह बयान बताता है कि राज्य में अफसरशाही ही असल ‘चालक’ बन बैठी है, और चुने हुए जनप्रतिनिधि उनके इशारों पर चलते हैं।
📉 “₹100 में से धरातल पर पहुंचता है सिर्फ ₹20”
विधायक उमेश कुमार ने योजनाओं का जो प्रतिशत-ब्रेकडाउन बताया, वह चौंकाने वाला है:
- 30% विधायक
- 15% ब्लॉक स्तर
- 18% GST
- 15% ठेकेदार
- और केवल 20% आम जनता तक
अगर यह सच है, तो यह सीधा इशारा करता है कि विकास की 80% ऊर्जा बीच में ही खत्म हो जाती है, और जो जनता तक पहुंचता है, वह बस फाइलों में मौजूद होता है।
🌄 “पलायन, खाली गांव और टूटी उम्मीदें”
उमेश कुमार ने कहा:
“सबसे बड़ा धोखा इस पहाड़ के साथ हुआ है। 43 आंदोलनकारियों के बलिदान से बने राज्य में आज अस्पताल नहीं हैं, पुल नहीं हैं, और 80 लाख लोग पलायन कर गए हैं।”
यह बात उत्तराखंड के दर्द को शब्द देती है — जहाँ राज्य तो मिला, लेकिन सपनों की बुनियाद कभी तैयार नहीं हो पाई।
🔍 क्या अब भी सब कुछ ‘ठीक’ है?
इस बयान ने केवल एक व्यक्ति की राय नहीं बताई, यह सिस्टम के भीतर की घुटन और जनता के साथ हो रहे धोखे को उजागर करता है।
राजनीतिक दल कोई भी हो, सत्ता में कोई भी हो — अगर काम से पहले ही कमीशन फिक्स हो रहा है, तो असली सवाल यह है:
क्या आम आदमी के हक का विकास कभी बिना दलाली के मिल पाएगा?