अफवाहें उड़ती नहीं, उड़ाई जाती हैं।
सत्ता के गलियारों में जो फुसफुसाहट होती है, वो कभी-कभी तूफ़ान की भूमिका निभा जाती है। दिल्ली की हवा इन दिनों गर्म है—और वजह है संभावित कैबिनेट फेरबदल। सुना जा रहा है, जून में कोई “छोटा सा” फेरबदल हो सकता है। लेकिन राजनीति में ‘छोटा’ शब्द कभी भी अपने शाब्दिक अर्थ में नहीं होता।
चार-छह नए चेहरे आ सकते हैं, और तीन-चार की छुट्टी हो सकती है। सवाल ये नहीं कि फेरबदल होगा या नहीं, सवाल यह है कि प्रधानमंत्री करेंगे क्यों? और अगर करेंगे, तो किसे संकेत देंगे?
2024 के बाद की नई सच्चाइयाँ
17वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों ने सत्ता संतुलन में एक महीन किंतु निर्णायक बदलाव किया है। NDA की सरकार है, लेकिन बहुमत अब पहले जैसा व्यापक नहीं। सहयोगी दलों की अहमियत बढ़ गई है, और BJP को अब हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा।
तो क्या ये फेरबदल सहयोगियों को साधने के लिए है? क्या कुछ पुराने चेहरों की विदाई के पीछे परफॉर्मेंस या पॉलिटिक्स है?
संभावित संकेत
- सामाजिक संतुलन: पिछड़े, दलित, महिला और युवा वर्ग से जुड़े चेहरों को शामिल करना BJP की नीति रही है। यह फेरबदल भी उसी दिशा में एक और कदम हो सकता है — विशेषकर तब, जब 2029 की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी हो।
- राजनीतिक इनाम या सज़ा?: कुछ राज्यों में हाल ही में हुए हार-जीत के असर से भी मंत्रालय प्रभावित हो सकते हैं। हार वाले राज्यों से चेहरों की छुट्टी और विजय वाले से नए इनामित मंत्री — यह एक पुराना, लेकिन प्रभावी तरीका रहा है संदेश देने का।
- राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय चेहरे: केंद्र में चेहरों का चयन अब केवल प्रशासनिक दक्षता पर नहीं, बल्कि भविष्य के राज्य चुनावों और NDA की मजबूती पर भी आधारित होगा।
क्या प्रधानमंत्री ऐसा करेंगे?
अब आता है असली सवाल — क्या वाकई मोदी ऐसा करेंगे?
उनकी कार्यशैली अप्रत्याशित है। वे अपने फैसलों की टाइमिंग को लेकर हमेशा चर्चा में रहते हैं। जब सब सोचते हैं कुछ नहीं होगा, तब कुछ बड़ा होता है। और जब सब तैयारी में होते हैं, तो सब स्थिर रहता है।
यही वजह है कि इस “छोटे फेरबदल” की अफवाह भी एक बड़ा राजनीतिक संकेत बन गई है। हो सकता है कुछ भी न हो — और हो सकता है सब कुछ बदल जाए।
एक बात तो तय है — अगर फेरबदल होता है, तो वो केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन की नई लकीर खींचेगा।